अदभुत महल : भूतों का महल
परिवेश Oct 16, 2020 at 08:23 PM , 1314भानगढ़ दुर्ग राजस्थान में स्थित 17वीं शताब्दी में निर्मित एक दुर्ग है. इसे मान सिंह प्रथम ने अपने छोटे भाई माधो सिंह प्रथम के लिए बनवाया था. इस दुर्ग का नाम भान सिंह के नाम पर है जो माधो सिंह के पितामह थे. इस दुर्ग की सीमा के बाहर एक नया गाँव बसा है जिसमें लगभग 200 घर और जनसंख्या 1300 है. यह दुर्ग और इसका अहाता अच्छी तरह संरक्षित है इस किले की देख रेख भारत सरकार द्वारा की जाती है. किले के चारों तरफ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानि ए एस आई की टीम मौजूद रहती हैं. पुरातत्व विभाग द्वारा इस क्षेत्र में सूर्यास्तज के बाद किसी भी व्यरक्ति के रूकने की अनुमति नही है.
भानगढ़ कि कहानी बड़ी ही रोचक है. सोलहवीं शताब्दी में भानगढ़ बसता है. 300 सालो तक भानगढ़ खूब फलता फूलता है. फिर यहाँ कि एक सुन्दर राजकुमारी पर काले जादू में महारथ तांत्रिक सिंधु सेवड़ा आसक्त हो जाता है. वो राजकुमारी को वश में करने लिए काला जादू करता है पर खुद ही उसका शिकार हो कर मर जाता है पर मरने से पहले भानगढ़ को बर्बादी का श्राप दे जाता है. संयोग से उसके एक महीने बाद ही पड़ौसी राज्य अजबगढ़ से लड़ाई में राजकुमारी सहित सारे भानगढ़ वासी मारे जाते है. इसके बाद भानगढ़ वीरान हो जाता है. तब से वीरान हुआ भानगढ आज तक वीरान है. कहते है कि उस लड़ाई में मारे गए लोगो के भूत आज भी रात को भानगढ़ के किले में भटकते है,क्योकि तांत्रिक के श्राप के कारण उन सब कि मुक्ति नहीं हो पाई थी. तो यह है भानगढ़ कि कहानी जो कि लगती फ़िल्मी है पर है असली.
भानगढ़ का किला, राजस्थान के अलवर जिले में स्थित है. इस किले सी कुछ किलोमीटर कि दूरी पर विश्व प्रसिद्ध सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान है. भानगढ़ तीन तरफ़ पहाड़ियों से सुरक्षित है. सामरिक दृष्टि से किसी भी राज्य के संचालन के यह उपयुक्त स्थान है. सुरक्षा की दृष्टि से इसे कई भागों में बांटा गया है. सबसे पहले एक बड़ी प्राचीर है जिससे दोनो तरफ़ की पहाड़ियों को जोड़ा गया है. इस प्राचीर के मुख्य द्वार पर हनुमान जी विराजमान हैं. इसके पश्चात बाजार प्रारंभ होता है. बाजार की समाप्ति के बाद राजमहल के परिसर के विभाजन के लिए त्रिपोलिया द्वार बना हुआ है. इसके पश्चात राज महल स्थित है. इस किले में कई मंदिर भी है जिसमे भगवान सोमेश्वर, गोपीनाथ, मंगला देवी और केशव राय के मंदिर प्रमुख मंदिर हैं. इन मंदिरों की दीवारों और खम्भों पर की गई नक़्क़ाशी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह समूचा क़िला कितना ख़ूबसूरत और भव्य रहा होगा. सोमेश्वर मंदिर के बगल में एक बाबड़ी है जिसमें अब भी आसपास के गांवों के लोग नहाया करते हैं. भानगढ़ क़िले को आमेर के राजा भगवंत दास ने 1573 में बनवाया था. भानगढ़ के बसने के बाद लगभग 300 वर्षों तक यह आबाद रहा. मुग़ल शहंशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल और भगवंत दास के छोटे बेटे और आमेर के महान मुगल सेनापति, मानसिंह के छोटे भाई राजा माधो सिंह ने बाद में सन 1613 इसे अपनी रिहाइश बना लिया. माधौसिंह के बाद उनका पुत्र छत्र सिंह गद्दी पर बैठा. विक्रम संवत 1722 में इसी वंश के हरिसिंह ने गद्दी संभाली. इसके साथ ही भानगढ की चमक कम होने लगी. छत्र सिंह के बेटे अजब सिह ने समीप ही अजबगढ़ बनवाया और वहीं रहने लगे. यह समय औरंगजेब के शासन का था. औरंगजेब कट्टरपंथी मुसलमान था. उसने अपने बाप को नहीं छोड़ा तो इन्हे कहाँ छोड़ता. उसके दबाव में आकर हरिसिंह के दो बेटे मुसलमान हो गए, जिन्हें मोहम्मद कुलीज एवं मोहम्मद दहलीज के नाम से जाने गये. इन दोनों भाईयों के मुसलमान बनने एवं औरंगजेब की शासन पर पकड़ ढीली होने पर जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह ने इन्हे मारकर भानगढ़ पर कब्जा कर लिया और माधो सिंह के वंशजों को गद्दी दे दी. कहते है कि भानगढ़ कि राजकुमारी रत्नाथवती बेहद सुन्दर थी. उस समय उनके रूप की चर्चा पूरे राज्य में थी. देश के कोने कोने के राजकुमार उनसे विवाह करने के इच्छुक थे. उस समय उनकी उम्र महज 18 वर्ष ही थी. उनका यौवन उनके रूप में और निखार ला चुका था. उस समय कई राज्यो से उनके लिए विवाह के प्रस्ताव आ रहे थे. उसी दौरान वो एक बार किले से अपनी सखियों के साथ बाजार में निकलती थीं। राजकुमारी रत्नाथवती एक इत्र की दुकान पर पहुंची और वो इत्रों को हाथों में लेकर उसकी खुशबू ले रही थी. उसी समय उस दुकान से कुछ ही दूरी सिंधु सेवड़ा नाम का व्यक्ति खड़ा होकर राजकुमारी बहुत ही गौर से देख रहा था. सिंधु सेवड़ा उसी राज्य में रहता था और वो काले जादू का महारथी था. ऐसा बताया जाता है कि वो राजकुमारी के रूप का दीवाना था और उनसे प्रगाण प्रेम करता था. वो किसी भी तरह राजकुमारी को हासिल करना चाहता था. इसलिए उसने उस दुकान के पास आकर एक इत्र के बोतल जिसे रानी पसंद कर रही थी उसने उस बोतल पर काला जादू कर दिया जो राजकुमारी के वशीकरण के लिए किया था. लेकिन एक विश्वसनीय व्यक्ति ने राजकुमारी को इस राज के बारे में बता दिया.
राजकुमारी रत्नाथवती ने उस इत्र के बोतल को उठाया, लेकिन उसे वही पास के एक पत्थर पर पटक दिया. पत्थर पर पटकते ही वो बोतल टूट गया और सारा इत्र उस पत्थकर पर बिखर गया. इसके बाद से ही वो पत्थर फिसलते हुए उस तांत्रिक सिंधु सेवड़ा के पीछे चल पड़ा और तांत्रिक को कुचल दिया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गयी. मरने से पहले तांत्रिक ने श्राप दिया कि इस किले में रहने वालें सभी लोग शीघ्र ही मर जायेंगे और वो दोबारा जन्म नहीं ले सकेंगे. ताउम्र उनकी आत्मांएं इस किले में भटकती रहेंगी.
उस तांत्रिक के मौत के कुछ दिनों के बाद ही भानगढ़ और अजबगढ़ के बीच युद्ध हुआ जिसमें किले में रहने वाले सारे लोग मारे गये. यहां तक की राजकुमारी रत्नाथवती भी उस शाप से नहीं बच सकी. उनकी भी मौत हो गयी. एक ही किले में एक साथ इतनी मौतों के बाद वहां मौत की चींखें गूंज गयी और आज भी उस किले में उनकी रूहें घूमती हैं.
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा खुदाई से इस बात के पर्याप्त सबूत मिले हैं कि यह शहर एक प्राचीन ऐतिहासिक स्थल है. फिलहाल इस किले की देख रेख भारत सरकार द्वारा की जाती है. किले के चारो तरफ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की टीम मौजूद रहती हैं. एएसआई ने सख्त हिदायत दे रखी है कि सूर्यास्त के बाद इस इलाके में किसी भी व्यक्ति के रूकने के लिए मनाही है. भारतीय पुरातत्व के द्वारा इस खंडहर को संरक्षित कर दिया गया है. गौर करने वाली बात है जहाँ पुरात्तव विभाग ने हर संरक्षित क्षेत्र में अपने ऑफिस बनवाये है वहीँ इस किले के संरक्षण के लिए पुरातत्व विभाग ने अपना ऑफिस भानगढ़ से दूर बनाया है. इस किले में कई मंदिर भी है जिसमे भगवान सोमेश्वर, गोपीनाथ, मंगला देवी और केशव राय के मंदिर प्रमुख मंदिर हैं. इन मंदिरो की एक यह विशेषता है कि जहाँ किले सहित पूरा भानगढ़ खंडहर में तब्दील हो चूका है वही भानगढ़ के सारे के सारे मंदिर सही सलामत है अलबत्ता अधिकतर मंदिरो से मूर्तियाँ गायब है. सोमेश्वर महादेव मंदिर में जरूर शिवलिंग है. दूसरी बात भानगढ़ के सोमेश्वर महादेव मंदिर में सिंधु सेवड़ा तांत्रिक के वंशज ही पूजा पाठ कर रहे है. लोगों का कहना है कि यहाँ भूत है यह बात सही है पर वो भूत किले के अंदर केवल खंडहर हो चुके महल में ही रहते है. महल से नीचे नहीं आते है क्योकि महल की सीढ़ियों के बिलकुल पास भोमिया जी का स्थान है जो उन्हें महल से बाहर नहीं आने देते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि रात के समय आप किला परिसर में रह सकते है कोई दिक्क्त नहीं है पर महल के अंदर नहीं जाना चाहिए. तो यह है भानगढ़ कि कहानी अब वहाँ भूत है कि नहीं यह एक विवाद का विषय हो सकता है पर यह जरूर है कि भानगढ़ एक बार घूमने लायक जगह है और यदि आप भानगढ़ घूमने का प्रोग्राम बनाये तो आप वहा सावन यानि जुलाई या अगस्त के महीने में जाए क्योकि भानगढ़ तीनो तरफ से अरावली कि पहाड़ियो से घिरा हुआ है. सावन में उन पहाड़ियो में बहार आ जाती है. यदि आपको सोमेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी से भानगढ़ का इतिहास सुनना हो तो आप सोमवार के दिन जाए क्योंकि पुजारी जी सोमवार को पूरा दिन मंदिर में रहते है बाकी दिन तो सुबह पूजा करके वापस चले जाते है.































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