*नारी और उसके विभिन्न रूप*

परिवेश , 1231

आज हम सब मित्र फ्रेंडशिप डे मनाते हुए मस्ती कर रहे थे। सब लोग आपस में मिलकर सामूहिक नृत्य हुआ ,गानों के माध्यम से हम सब मनोरंजन में व्यस्त थे। तभी मस्ती के मूड में ही सही वहां पड़े हुए स्टेज के गद्दे में लेटकर मैं अपने साथियों का नृत्य देख रही थीं। मज़ाक में हमने कड़क नोट सामंतवादी प्रथा की तरह उड़ाने के लिए निकालें........ तभी एक सेकेंड के लिए ही सही यह एहसास हुआ कि.... वाकई उस महिला पर क्या बीती होगी जो अपने सामने बैठे सभी पुरुषों में अकेले खड़े होकर ना चाहते हुए भी अपने शरीर की उन भंगिमा को दिखाती होगी, शरीर के विभिन्न अंगों पर होते कटाक्ष और पुरुषों की ललचाई नजरों का हर पल सामना करती होगी। 
         पुरुषों से भरी सभा में, कमर आंखें और सुडोलता पर लाखों रुपए इसी तरह लेट कर जमीदार और सामंतवादी और धनाड्य लोग उड़ाया करते होंगे ।आज भी शायद बड़े प्रतिष्ठित और पैसे वाले लोग ऐसा करते है....... निश्चित रूप से आधुनिकता ने स्टेज का आकार बदल दिया है... और एक पल के लिए सदियों से महिलाओं के इस प्रकार होते अपमान का एहसास हुआ ।
             एक भी रुपए मैं मज़ाक में भी न उड़ा सकी,ऐसा लगा कि रूपए उड़ाकर मज़ाक हसीं ठिठोली में ही सही अपने महिला साथियों का अपमान करूंगी और मैं वहीं रुक गई। 
अपने इस अहसास को मैं किसी को बता ना सकी पर वाकई अफसोस हुआ मन कल्पना करके दुःखी हुआ। हमारे भारतीय समाज में दोहरा भाव पुरातन काल से रहा, एक तरफ़ जब एक महिला घर में घूंघट में रहती थी और बहुत ही कड़ाई से पर्दा प्रथा का पालन होता था वहीं  दूसरी तरफ़ मजबूर की गई महिला को पुरुषों के हवस और महिला को मनोरंजन का सामान , खरीदने बेचने की वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं समझते थे।............ भारतीय रंगमंच ने भी हमारे समाज के सदियों से बने इस काले चेहरे को प्राचीन काल से लेकर अब तक चलचित्र के माध्यम से समाज के सामने रखा है समाज के इस काले चेहरे को हमने बहुत ही संस्कारी तरीके से अपनाया भी है. 
 
 वाकई साहब बीवी और गुलाम, पाकीज़ा ,उमराव जान, सराफत, प्यासा, मौसम,गंगूबाई काठियावाड़ी .... और लीला भंसाली जी की नई मूवी आने वाली है... पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को मनोरंजन की वस्तु दिखाता फिल्मी जगत ,यादगार फिल्म पाकीजा में मीना कुमारी ने एक तवायफ के किरदार को बड़ी ही सहजता और मासूमियत के साथ निभाया था। इसकी कहानी ने हमें यह बताया कि एक तवायफ का जीवन बहुत ही जिल्लत भरा होता है। उसको दुनिया एक वस्तु की तरह समझती है और यह भूल जाती है कि वो भी एक इंसान है एक औरतका दिल भी जीवित होता है।   
     ना जाने आप के मानस पटल पर ऐसी कितनी ही फिल्में 1 मिनट में तैर जाएंगी जहां हमने कभी ना कभी महिलाओं को नाचते हुए और पुरुषों को उन पर पैसे लुटाते हुए देखा होगा।
   समाज में होते अधिकृत और अनधिकृत दोनों ही तरह के अपराधों का मूल कारण समाज में व्याप्त नशा ही है शायद नशे के चंगुल में फंस कर ही व्यसन वासना जैसी कुरीतियां समाज में पनपती हैं और इन सब का वैध और अवैध तरीके से सामना घर की दहलीज के अंदर हो या ऐसे बाजारों में बिकती हुई महिलाओं को ही करना पड़ता है।
*काश महिला दिवस मनाने वाले हम भारतीय इस कुप्रथा कुरीति और मनोरंजन के समान की तरह इस्तमाल होती औरतों को बचा सके, उन पर पैसे लुटाने वालों को गंभीर अपराधों की श्रेणी में सजा दिला सकें, इन सब के मूल कारण के रूप में नशे को समाज से हमेशा के लिए खत्म कर सकें और चाहे स्वेच्छा  से हो या किसी मजबूरी से इस तरह के कामों को करने वाली महिला को सम्मान दिला सकें, एक महिला के रूप में जन्म लेने वाली हर एक महिला सम्मान से जी सके भारत में ऐसा समाज बन सके यही सावन के इस पावन महीने में भगवान भोलेनाथ से प्रार्थना है*
????????????????????
@रीना त्रिपाठी

Related Articles

Comments

Back to Top