विश्वास पर चोट और खोखली व्यवस्था
संपादकीय Jun 20, 2026 at 06:08 AM , 19अयोध्या के भव्य श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित किए गए चढ़ावे और आभूषणों में गड़बड़ी का मामला केवल कुछ छोटे कर्मचारियों की लालच या साधारण चोरी तक सीमित नहीं है। विशेष जांच दल (ैप्ज्) की परत-दर-परत खुलती पड़ताल यह साफ इशारा कर रही है कि यह देश के करोड़ों सनातनी आस्थावानों के अटूट विश्वास पर एक बहुत बड़ा आघात है। जो मंदिर परिसर देश की अस्मिता और भक्ति का केंद्र है, वहां से श्रद्धालुओं की दी हुई चांदी की चरण पादुकाएं और रत्नों से जड़े हार गायब हो जाएं और उनका कोई रिकाॅर्ड तक न मिले, यह बेहद चिंताजनक और शर्मनाक है। इस पूरे प्रकरण ने देश के सबसे बड़े वित्तीय संस्थान, भारतीय स्टेट बैंक (ैठप्) की साख और उसकी सुरक्षा-प्रक्रिया पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। जब बैंक के आला अधिकारियों ने मंदिर के चढ़ावे और चंदे की पाई-पाई सुरक्षित रखने का विस्तृत एमओयू (डवन्) किया था, दानपात्रों की चाबियां बैंक के पास थीं, तो फिर यह सेंधमारी कैसे संभव हुई? यदि बैंक ने गणना के लिए किसी तीसरी एजेंसी (जैसे टीसीएस) को शामिल किया था, तो उसकी निगरानी और सत्यापन की जवाबदेही किसकी थी? बैंक और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के बीच समन्वय की यह ढील इस बात का प्रमाण है कि नियम केवल कागजों तक सीमित रह गए थे। सबसे अधिक निराशाजनक पहलू मंदिर प्रबंधन और ट्रस्ट की सामूहिक जवाबदेही का पूरी तरह फेल होना है। प्रधानमंत्री के दूत माने जाने वाले निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र, ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और अन्य रसूखदार न्यासियों की नाक के नीचे छह साल से लूट की स्क्रिप्ट लिखी जा रही थी, लेकिन उनकी आंखें तब खुलीं जब कलंक का टीका माथे पर लग चुका था। सेवानिवृत्त इंजीनियर दीनानाथ वर्मा के बयानों और जौनपुर के कारोबारी अजय विश्वकर्मा जैसे भुक्तभोगियों के दावों ने यह साबित कर दिया है कि निगरानी व्यवस्था में गंभीर ‘सिस्टमैटिक फेलियर’ (संस्थागत विफलता) था। एसआईटी की जांच अब अंतिम चरण में है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को रिपोर्ट सौंपी जाने वाली है। सीसीटीवी फुटेज और दस्तावेजों के मिलान से असली गुनहगारों के चेहरे बेनकाब होना तय है। लेकिन इस जांच का असल मकसद केवल कुछ चेहरों को जेल भेजना नहीं होना चाहिए, बल्कि उस समूची व्यवस्था का कायाकल्प करना होना चाहिए जिसने इस पवित्र परिसर को दागदार किया। रामलला का दरबार पारदर्शिता और सुचिता का प्रतीक होना चाहिए, न कि प्रशासनिक लापरवाही और संस्थागत गैर-जिम्मेदारी का।































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