मोबाइल, माइक्रोफोन और 'तुरंत पत्रकार' की फैक्ट्री: क्या पत्रकारिता प्रशिक्षण से नहीं, सिर्फ उपकरणों से तय होगी?
राष्ट्रीय Jul 19, 2026 at 06:36 AM , 75पत्रकारिता केवल खबर लिखने का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की चेतना, समाज का दर्पण और सत्ता से जवाबदेही मांगने का सबसे प्रभावी औजार है। लेकिन डिजिटल युग की तेज रफ्तार ने इस पेशे को जितनी नई संभावनाएं दी हैं, उतनी ही गंभीर चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं। आज स्थिति यह है कि कभी पत्रकार बनने के लिए वर्षों का प्रशिक्षण, संपादकीय अनुशासन और समाचार की समझ जरूरी मानी जाती थी, जबकि अब कई लोग केवल एक मोबाइल फोन, माइक्रोफोन और सोशल मीडिया अकाउंट के सहारे स्वयं को पत्रकार घोषित कर देते हैं।
हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट की यह टिप्पणी कि "आज मोबाइल और माइक्रोफोन लेकर कोई भी स्वयं को पत्रकार घोषित कर सकता है" केवल एक न्यायिक टिप्पणी नहीं, बल्कि वर्तमान पत्रकारिता की बदलती तस्वीर पर गंभीर चिंतन का विषय है। यह टिप्पणी उस वास्तविकता को सामने लाती है, जिसमें पत्रकारिता का पेशा तेजी से पेशेवर प्रशिक्षण से हटकर तात्कालिक लोकप्रियता की ओर बढ़ता दिखाई देता है।
एक समय था जब छोटे-छोटे स्थानीय समाचार पत्र पत्रकारिता की प्रयोगशाला हुआ करते थे। वहां प्रशिक्षु संवाददाता अपनी पहली खबर लेकर संपादक के सामने बैठता था। संपादक केवल खबर नहीं सुधारता था, बल्कि संवाददाता की सोच, भाषा, तथ्य और दृष्टिकोण को भी गढ़ता था। एक-एक शब्द की शुद्धता, तथ्यों की पुष्टि और प्रस्तुति की मर्यादा वहीं सिखाई जाती थी। पत्रकारिता किसी विश्वविद्यालय से कम और संपादक की लाल स्याही से अधिक सीखी जाती थी।
प्रशिक्षु संवाददाता समाचार लिखने के साथ कंपोजिंग करता, प्रूफ पढ़ता, मशीन के पास खड़ा रहता और अखबार छपने तक पूरी प्रक्रिया को समझता था। उस दौर में पत्रकारिता का प्रमाण-पत्र कोई पहचान पत्र नहीं, बल्कि मेहनत, अनुशासन और सीखने की निरंतर प्रक्रिया होती थी। यही कारण था कि छोटे समाचार पत्रों की स्याही से निकले अनेक पत्रकार आगे चलकर राष्ट्रीय समाचार पत्रों और बड़े इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थानों तक पहुंचे।
फिर तकनीक ने दस्तक दी। कंप्यूटर आया, इंटरनेट आया और उसके बाद स्मार्टफोन ने पूरी दुनिया को हथेली पर ला दिया। तकनीक ने पत्रकारिता को गति, विस्तार और नई शक्ति दी, लेकिन इसके साथ एक नई समस्या भी पैदा हुई—बिना प्रशिक्षण के पत्रकार बनने की जल्दबाजी।
आज अनेक स्थानों पर पत्रकारिता सीखने का पहला प्रश्न यह नहीं होता कि "समाचार कैसे लिखा जाए?" बल्कि यह होता है कि "विज्ञापन पर कितना कमीशन मिलेगा?" ज्ञान की जगह कमाई की गणना और जनहित की जगह प्रचार ने धीरे-धीरे अपनी जगह बना ली। परिणामस्वरूप कई जगह संवाददाता कम और विज्ञापन-संग्रहकर्ता अधिक तैयार होने लगे।
सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया। अब न संपादकीय मार्गदर्शन की आवश्यकता महसूस होती है, न तथ्य-जांच की चिंता और न ही समाचार की पुष्टि का धैर्य। जेब में मोबाइल, हाथ में माइक्रोफोन और सोशल मीडिया पर एक पेज बनते ही कई लोग स्वयं को वरिष्ठ पत्रकार घोषित कर देते हैं। सुबह किसी नेता का गुणगान, दोपहर में किसी अधिकारी का लाइव प्रसारण और शाम को किसी व्यापारी का प्रचार—इसे ही "ब्रेकिंग न्यूज़" का नाम दे दिया जाता है।
यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि समस्या मोबाइल फोन या सोशल मीडिया नहीं है। तकनीक स्वयं कभी दोषी नहीं होती। दोष उस सोच का है, जिसने उपकरणों को ही पत्रकारिता मान लिया। कैमरा दृश्य दिखा सकता है, लेकिन दृष्टि नहीं दे सकता। माइक्रोफोन आवाज़ पहुंचा सकता है, लेकिन सत्य की समझ नहीं। सोशल मीडिया पहचान दिला सकता है, लेकिन विश्वसनीयता अर्जित नहीं कर सकता।
सच्ची पत्रकारिता आज भी वही है, जो दशकों पहले थी—तथ्यों की पुष्टि, निष्पक्षता, जनहित, संवेदनशीलता और सत्ता से सवाल पूछने का साहस। तकनीक इस यात्रा का साधन हो सकती है, उसका विकल्प नहीं।
यदि पत्रकारिता में प्रशिक्षण की जगह शॉर्टकट, तथ्य की जगह सनसनी, जनहित की जगह प्रचार और जिम्मेदारी की जगह केवल लोकप्रियता का आकर्षण हावी हो गया, तो आने वाले समय में पत्रकारों की संख्या भले बढ़ जाए, लेकिन पत्रकारिता का स्तर लगातार गिरता जाएगा।
लोकतंत्र को कैमरे वाले चेहरे नहीं, बल्कि सच लिखने और सच बोलने का साहस रखने वाले पत्रकार चाहिए। मोबाइल पत्रकार बना सकता है, लेकिन पत्रकारिता नहीं सिखा सकता। पत्रकारिता आज भी सीखनी पड़ती है, जीनी पड़ती है और हर दिन अपने आचरण से साबित करनी पड़ती है।






























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