अदभुत क़िला: गढ़कुंडार का किला
परिवेश Sep 21, 2023 at 06:42 AM , 1719अमरेन्द्र सहाय अमर
हमारा देशमें अजूबो और रहस्यों की एक लम्बी फेहरिश्त है. आजहमएक ऐसे ही किले के बारे में जानकारी देने जा रहेहैं जो रहस्यों और अजूबों से भरा है . जी हाँ यह है गढ़कुंडार का क़िला. यह किला जनपद झांसी से 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.इस किले को कब बनवाय गया , किसने बनवाया इसका कोई लिखित प्रमाण नही है लेकिन कहा जाता है इसका निर्माण 11 वीं सदी में हुआ था .यह1500 से 2000 साल पहले का बना बताया जाता है. यहां चंदेलो, बुंदेलोंऔर खंगार जैसे कई शासकों का शासन रहा है. पांच मंजिल वाले इस किले तीन मंजिल तो ऊपर है जबकि दो मंजिल जमीन के नीचे बना है. यह किला दुश्मनों को अपने पास पहुंचने नहीं देता था. दूर से विशाल दिखने वाला किला पास पहुंचते-पहुंचते आंखों से ओझल हो जाता. इसके गायब होने की पहेली को समझना बहुत आसान है. किला असल में चारों तरफ से छोटी-छोटी पहाड़ियों से घिरा है. जैसे-जैसे आप आगे बढ़ेंगे, आसपास की पहाड़ियां बड़ी दिखने लगेंगी और किला उनके पीछे छिपता चला जाएगा. आगे चलने पर भी यह मुश्किल हल नहीं होती. तब कई रास्ते नज़र आने लगते हैं, और यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता है कि किले की ओर कौन सा रास्ता जाएगा. इसीलिए किले पर हमला करने आई दुश्मन सेनाएं गलत रास्ते पर भटक जातीं.
अगर कोई किले के पास पहुंच भी जाए तो इसे जीतना आसान नहीं था. किले की ऊंची और मोटी दीवारों पर चढ़ना लगभगनामुमकिन था. दुश्मन के आते ही दुर्ग की रक्षा कर रही सेना परकोटे के छेदों से नीचे हमला बोल देती और दुश्मन बाल भी बांका न कर पाते. आप अगर वहां जाएं तो निगरानी के लिए बनाए गए कई बुर्ज आज भी सही सलामत मिल जाएंगे. इसे गढ़कुंडार का दुर्ग कहते हैं, जिसे चंदेल राजा यशोवर्मन ने नौवीं सदी में बनवाया था. कई पीढ़ियों तक वहां चंदेलों का शासन रहा, लेकिन सन 1182 में पृथ्वीराज चौहान ने राजा परमार्दि देव को हराकर चंदेलों की राजधानी महोबा पर कब्जा कर लिया. इस जीत के फौरन बाद महोबा से कोई सवा सौ किलोमीटर दूर बना यह दुर्ग भी उनके कब्ज़े में आ गया.
पृथ्वीराज चौहान ने तब अपने खास सेनापति खेतसिंह खंगार को गढकुंडार का किलेदार बना दिया. दस साल बाद 1192 में पृथ्वीराज जब मोहम्मद ग़ोरी से युद्ध हार गए, तब खेतसिंह ने खुद को गढ़कुंडार का राजा घोषित कर दिया. इस तरह बारहवीं सदी के आखिरी दशक में शुरू हुआ खंगारवंश का राज. इस वंश की चार पीढ़ियों ने गढ़ कुंडार पर शासन किया. इस दौरान खंगार शासकों ने नई सामाजिक और धार्मिक प्रथाएं शुरू कीं, जो बुंदेलखंड के कई ग्रामीण और उपनगरीय क्षेत्रों में आज भी ज़िंदा हैं.
कहते हैं, कि खंगार राजा नारी सम्मान को लेकर बेहद सजग थे. उनके दौर में ही बेटी पूजन की शुरुआत हुई. यह प्रथा बुंदेलखंड के कई क्षेत्रों में तब से चली आ रही है. स्थानीय लोगों के बीच लोककथाएं और लोकगीत भी मशहूर हैं जिनसे खंगार राज का इतिहास पता चलता है. ऐसी ही दो कथाओं में खंगारवंश के अंत का पता चलता है. एक कथा के मुताबिक, सन 1347 में मोहम्मद बिन तुगलक ने गढ़कुंडार पर हमला किया और खंगार राजा मानसिंह को हरा दिया.हार के फौरन बाद राजा मानसिंह की बेटी ‘केसर दे’ ने महल की दासियों और राज्य की कई अन्य स्त्रियों के साथ अग्नि कुंड में कूदकर जौहर कर लिया. केसर दे के बलिदान के लोकगीत इस क्षेत्र में आज भी गाए जाते हैं. वह विशाल कुंड आज भी किले के अंदर मौजूद है. इतिहास की पड़ताल में लगे लोगों के मुताबिक, तुगलक के बाद गढ़कुंडार बुंदेला शासकों के पास आ गया.
आस पास के लोग बताते हैं कि बहुत समय पहले यहाँ पास के एक गाँव में एक बारात आईथी. बरात में आये लोग घूमते घूमते किले के बेसमेंट में चले गये . इसके बाद यह सभी बाराती रहस्यमय ढंग से गायब हो गये. उन50 –60 बारातियों का आज तक पता नहीं चला कि वे कहाँ चले गये. कुछ लोगों का मानना है इस किले में कोई गुप्त खजानाहै. इतिहासके जानकार बताते हैं कि यहाँ के राजाओं के पास सोने, हीरे जवाहरातों कि कोई कमी नहीं थी इस खजाने की खोज में कई लोगों की जान जा चुकी है. इसके बाद कुछ और इस तरह की घटनाये हुई तो किले के नीचे जाने वाले सभी दरवाजों को बंद कर दिया गया. दरअसल यह किला भूलभुलैयाकीतरह है. अगर इसके बारे में जानकारी न हो तो अधिक अन्दर जाने पर कोई भी इस किले के अन्दर दिशा भूल सकता है































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