भ्रष्टाचारियों-अपराधियों की क्या मजाल जो कलमकारों को दे धमकी

लखीमपुर खीरी , 174

पत्रकारों पर षड़यंत्र रच रहे, तस्कर व गलत धन्धों में पड़ने वाले पत्रकार
पलिया कलां खीरी। पत्रकारिता भी एक जुनून है, जिसका कुछ पत्रकारों ने गलत कामो को जैसे तस्करी करवाना, मादक पदार्थ बेचना, विना रजिस्ट्रेशन के अस्पताल, मेडिकल स्टोर चलाना, लकडी की कटाई आरा मशीन चलाना, बाॅडर पर तस्करो से सांठ-सांठ मोटी कमाई करना, बाॅडर पर हो रहे गलत कामे में सम्लिता दिखाना, अधिकारियों के आगे पीछे घूमकर पत्रकारों की बुराईयों को अधिकारियों के सामने गिनाना, ऐसे हजारो कामों को अन्जाम देने वाले लोगों को असली पत्रकार बताया जाता है क्योंकि इन लोगों से शासन प्रशासन तथा पुलिस नेताओ को ज्यादा मुनाफा होता है यह लोग उन्ही लोगों के लिए पत्रकार बनकर काम भी कर रहे है जो समाज को तो गन्दा कर ही रहे है लेकिन कुछ सच्चाई लिखने वाले पत्रकारों की लेखनी पर भी पत्रकार के ही लोग सवाल खड़े करने व लोगों की चाटुकारिता करने पहुंच जाते है। किसी भी गलत या भर्ष्टाचार के खिलाफ लिखा गया तो तमाम पत्रकार उसके साथ खडे होने के बजाए कुछ नादान पत्रकार जो अपने आप में भले ही बहोत बुद्धिमान हो वह सभी लोग सच्चाई लिखने वाले के खिलाफ खडे हो जाते है और वही लोगों सभी पत्रकारों की भावनाओ को भी गन्दा करने के लिए लगे रहते है। पत्रकारों की आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय होती है कि उल्लेख करने में भी हिचक पैदा होती है। हर समय अखबार मालिकों की तलवार तो उसकी गर्दन पर लटकी ही रहती है साथ ही सामाजिक दायरा निभाने की जिम्मेदारी भी। इसके अलावा अपराधियों, माफियाओं, भ्रष्ट राजनेताओं, अधिकारियों व पुलिस की आंखों की किरकिरी बनना पड़ता है। बदले में मिलती है धमकियां, मौत और हमले जैसी साजिश रची जाती हैं  देश आजादी के बाद भी लोकतंत्र का चैथा-स्तम्भ हमेशा ही खतरे में रहा है। अंग्रेजी शासन में अंग्रेजों ने उनके खिलाफ लिखने वाले अखबारों को जब्त करना, छापाखाना बंद करवा देना, पत्रकारों पर जुल्म ढाहना जैसी हरकतें कर प्रेस की आवाज दबाने का हर संभव प्रयास किया। यही प्रक्रियाएं आज के स्वतंत्र भारत में भी अपनायी जा रही हैं। प्रेस पर राजनीति, पुलिस अफसरशाही और नाना प्रकार के माफिया हावी होते जा रहे हैं। सच लिखने वालों का हश्र क्या हो रहा है किसी से छिपा नहीं है। वही सच लिखने वाला कलम का सिपाही सुरक्षित नहीं है। ऐसा नहीं कि यह पहली बार हो रहा हो, न जाने बीते सालों में कितने ही पत्रकारों पर हमले व मौत के घाट उतारने की घटनाएं घटित हो चुकी हैं। आज हमारे देश में पत्रकारों के हित के लिए अनगिनत संगठन बने हुए हैं। भारतीय प्रेस परिषद है फिर भी प्रेस की आजादी पर ऐसा हमला करने वाले बेहिचक हिम्मत जुटाते रहते हैं। पत्रकार संगठनों के सामने ऐसी घटनाएं चुनौतियां बनती जा रही हैं।

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