वनमाफिया तथा शिकारी,वन विभाग पर भारी

लखीमपुर खीरी , 111

बेलरायां खीरी। इसे वन विभाग की कामयाबी कहें या नाकामी की दुर्लभ प्रजाति के वन्यजीवों के शिकार तथा लकड़ी कटान को रोक पाने में वन विभाग नाकाम हो रहा है।ये अलग बात है कि गाहे-बगाहे शिकारियों तथा माफियाओं को पकड़कर वन विभाग जेल भेजकर अपनी पीठ भले ही थपथपा लेता हो लेकिन शिकार तथा लकड़ी कटान बदस्तूर जारी है।जबकि वन विभाग की मंशा के अनुरूप वन संपदा को बचाने के लिए शासन ने स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स से लेकर एसएसबी तथा पुलिस को भी वनमाफियायों तथा वन्यजीवों के शिकार में लगे लोगों को पकड़ने में विभाग की मदद के लिए लगा दिया है,अब सवाल उठता है की लगभग आधा दर्जन जांच तथा सुरक्षा एजेंसियों के रहते हुए भी दुधवा टाइगर रिजर्व का आरक्षित जोन हो या बफर जोन जिसमें लकड़ी कटान से लेकर दुर्लभ प्रजाति के वन्यजीवों का शिकार धड़ल्ले से हो रहा है जिसकी जानकारी आपको आये दिन समाचार पत्रों से मिल रही है। लेकिन वन विभाग इन वनमाफियायों तथा शिकारियों के आगे बेबस नजर आ रहा है।अब सवाल यह उठता है कि अगर वन विभाग अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन है,तो वनमाफिया और शिकारी अपने मंसूबों में कामयाब क्यों हो जाते हैं,और नही तो हल्का के फारेस्टर सहित अन्य वन कर्मियों पर लकड़ी कटान से लेकर वन्यजीवों के शिकार पर कार्यवाही क्यों होती है। बुद्धजीवियों का मानना है कि जब किसी वनमाफिया को लकड़ी कटान तथा शिकारी को वन्यजीव के शिकार में जेल भेजा जाता है तो जिस क्षेत्र में कटान व शिकार हुआ है वहां के वन कर्मियों के ऊपर वन विभाग आरोप क्यों नही तय करता है।वन विभाग अपने कर्तव्यों के प्रति इसी तरह उदासीन रहा तो आने वाले वक्त में दुधवा टाइगर रिजर्व तथा बफरजोन के बेशकीमती जंगल तथा उसमें विचरण करते दुर्लभ प्रजाति के वन्यजीवों से लेकर पशु पक्षियों के वजूद का वजूद बचेगा या नही ये आने वाले समय के आगोश में है।
बॉक्स,,सूत्रों के मुताबिक बीसियों साल से जमे क्षेत्रीय डेलीवेज कर्मचारियों की मिलीभगत से वनमाफियायों का धंधा दिनरात फलफूल रहा है।
बॉक्स,,वन तथा वन्यजीव प्रेमियों की शासन से मांग है कि वन कर्मियों की जांच किसी अन्य जांच एजेंसी से कराई जाय।

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