पर्यटन से जुड़ेगा महाभारत कालीन अंतर्वेद आश्रम बदलेगी काया डेढ़ करोड़ धनराशि हुईं मंजूर:,

लखीमपुर खीरी , 123

लखीमपुर खीरी। पढुआ थाना क्षेत्र स्थित महाभारत कालीन अंतर्वेद आश्रम की काया अब बदलने वाली है। पर्यटन विभाग को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है। पर्यटन सूचना अधिकारी संजय भंडारी ने बताया कि अंतर्वेद को पर्यटन से जोड़ने के लिए सरकार ने डेढ़ करोड़ रुपये मंजूर किए हैं। द्वापर युग में पांडवों की तपोस्थली के रूप में विख्यात अंतर्वेद वन वर्तमान में प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है। इस ऐतिहासिक स्थल तक पहुंचने के लिए न तो पक्का मार्ग है और न ही विद्युतीकरण की सुविधा है। यहां के अधिकांश क्षेत्र पर वन विभाग का कब्जा है, जिसके कारण साधु-संतों और आम लोगों का भी इस धरोहर से मोहभंग हो गया है।मान्यता है कि द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहां तेरह महीने बिताए थे। शत्रुओं के अचानक आक्रमण से बचाव के लिए महाबली भीम ने तीन किलोमीटर में फैले घने जंगल के चारों ओर एक बड़ी झील बनाई थी। उन्होंने अपने आने-जाने के लिए पूर्व दिशा में एक द्वार भी बनाया था, जिसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। तेरह माह का अज्ञातवास पूरा करने के बाद पांडव यहां से हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान कर गए थे।अंतर्वेद आश्रम के महंत श्री गोकुल दास के अनुसार, एक समय में यहां सैकड़ों साधु-संत निवास करते थे। हालांकि, शासन-प्रशासन की अनदेखी के कारण अब यह ऐतिहासिक स्थल उन्हें भी रास नहीं आ रहा है। आश्रम में स्थित श्री रामजानकी मंदिर में अब इक्का-दुक्का साधु-संत ही दिखाई देते हैं। आश्रम परिसर में रामजानकी मंदिर के अतिरिक्त शिवजी और काली माता के मंदिर भी हैं। इसके चारों ओर कई ऋषि-मुनियों के समाधि स्थल भी मौजूद हैं। महाबली भीम द्वारा खोदी गई झील भी सफाई के अभाव में जलकुंभी से भर गई है।

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