कम्बल वितरण कार्यक्रम सेवा नहीं, गरीबी का सार्वजनिक प्रदर्शन हैं एक कम्बल में नंगी हो जाती है अमीरी

लखीमपुर खीरी , 147

नरेंद्र मिश्रा 

मैगलगंज खीरी ! जैसे ही ठंड दस्तक देती है, वैसे ही समाज की तथाकथित संवेदनाएँ जाग जाती हैं।
कम्बल वितरण की होड़ लग जाती है लेकिन सवाल यह है कि कम्बल बाँटे जा रहे हैं या गरीबों की इज्ज़त गरीबों को ठंड से बचाने के नाम पर मंच सजते हैं, कुर्सियाँ लगती हैं, माइक गरजते हैं और कैमरे चमकने लगते हैं। पहले गरीबों की सूची बनती है, फिर पर्चियाँ बाँटी जाती हैं मानो मदद नहीं, कोई सरकारी परीक्षा हो। किसी रसूखदार चेहरे को मुख्य अतिथि बनाया जाता है। उसके स्वागत में कसीदे पढ़े जाते हैं। पत्रकार बुलाए जाते हैं ताकि दयालु बनने का प्रमाण समाज को दिखाया जा सके।गरीब जिसकी ठंड सबसे बड़ी सच्चाई है एक कम्बल की आस में घंटों पहले लाइन में खड़ा रहता है। फिर मंच से नाम पुकारा जाता है गरीब को मंच पर बुलाया जाता है कैमरे उसकी फटी चप्पल, झुकी नज़र और मजबूरी को कैद कर लेते हैं।दो सौ रुपये का कम्बल थमाकर उसकी गरीबी को दुनिया के सामने परोस दिया जाता है। वह तस्वीर अगले दिन अख़बारों में छपती है एक तरफ मुस्कुराता अमीर,दूसरी तरफ मजबूर गरीब यही तस्वीर अमीरी की असल पहचान है। कम्बल वितरण के नाम पर गरीब की ठंड कम नहीं,उसका अपमान ज़रूर बढ़ा दिया जाता है।कम्बल वितरण कार्यक्रम सेवा नहीं, गरीबी का सार्वजनिक प्रदर्शन हैं। यदि सच में मदद करनी है तो गरीब को मंच पर चढ़ाने की ज़रूरत नहीं, कैमरों के सामने खड़ा करने की मजबूरी नहीं।मदद ऐसी हो जो चुपचाप हो,सम्मान के साथ हो, बिना प्रचार के हो।क्योंकि मुट्ठी बंद कर की गई मदद ही ईश्वर को स्वीकार होती है। कम्बल दीजिए,लेकिन गरीब की इज्ज़त को लपेट कर नहीं। ठंड से कोई गरीब न मरे पर उसकी गरीबी तमाशा भी न बने।

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