*संतानहीनता ... शाप प्रकरण..और उसका ज्योतिषीय सम्बन्ध*

लखीमपुर खीरी , 110

(प्रस्तुति के0के0शुक्ला)
      संसार मे सभी प्राणी संतति सुख की कामना करते हैं। सृष्टि के मूल में कामशक्ति है । कामशक्ति जनित सुख और उसकी फलरूप उत्पन्न सन्तति में प्राणी का सर्वाधिक ममत्व प्रकृतिप्रदत्त स्वभाव है। मनुष्य सर्वाधिक चैतन्य प्राणी है। उसको अपने लौकिक और पारलौकिक दोनो के समग्र विकास की सदा कामना रहती है। मानव स्वयं तो अपने अभ्युदय के लिए प्रयास करता ही है, अपने संतति के साथ संयुक्त होकर भी प्रयास की कामना करता है। 
      इसलिए मानव द्वारा अपने अंश रूप पुत्र की प्राप्ति के लिए सभी प्रयत्न धर्मशास्त्र अंतर्गत अनुमोदित हैं। 
     मनुष्य के विवाह संस्कार का मुख्य उद्देश्य ही पुत्र प्राप्ति बताई गयी है। किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में मानव के धर्म और संस्कारहीन होते जाने की स्थिति में संतानहीनता या असुर वृत्ति की संतति दारुण दुख का प्रमुख कारण बन कर मानव को अभिशापित जीवन जीने के लिए विवश कर रही है। 
     अपनी लौकिक और पारलौकिक उन्नति में बाधा रूप 'संतानहीनता' का दंड प्राप्त होने में कई बार शाप भी कारण होता है जो जन्माङ्ग अंतर्गत विशिष्ट ग्रहयोग रूप में प्रकट होता है । इस अपुत्र योग को हम सर्प शाप, पितृ शाप, मातृ शाप, भ्रातृ शाप, ब्रह्म शाप, पत्नी शाप, प्रेत शाप, मातुल शाप, गुरु शाप, धेनु शाप आदि के रूप में अनुभव करते हैं। 
     जन्मांग अंतर्गत निर्मित कुछ विशिष्ट ग्रहयोगों द्वारा ये शाप अपने अस्तित्व का संकेत देते हैं।  यदि इस शाप के शमन का समुचित प्रयत्न किया जाय तब शाप के खंडित होने का भी प्रभाव स्पष्ट ही परिलक्षित होता है। जो जातक को संतान सुख के रूप में प्राप्त होता है। अतः निःसंतान दंपत्ति को एक बार अपने जन्मांग का अध्ययन उस ज्योतिषी से भी अवश्य करा लेना चाहिए जो शाप योग का विद्वान् हो।
       साथ ही उन देवतुल्य ज्योतिषी के बताये हुए समुचित उपचार का भी अवश्य ही सांगोपांग पूर्ण करना चाहिए । अग्रे प्रारब्ध बलवती। ॐ। 

अब शाप योग का वर्णन करते हैं...।
सर्पदोष :-  
      १. जिस जातक के जन्मांग में राहु मंगल की राशि का होकर पंचमस्थ हो या मङ्गल से युत/दृष्ट हो । तब जातक के अपुत्र योग का कारण सर्पदोष होता है ।
      २. पंचमेश राहु युत हो, शनि पंचमस्थ हो, शनि चन्द्रमा से युत/दृष्ट हो तब सर्प दोष होता है ।
      ३. पुत्रकारक राहु युत हो, पंचमेश बलहीन हो और लग्नेश मङ्गलयुत हो तब सर्प दोष निर्मित होता है।
      ४.  पंचमेश त्रिक (६, ८, १२) में हो, पुत्रकारक मङ्गलयुत हो और राहु लग्नस्थ हो तब सर्पशाप से अपुत्रयोग निर्मित होता है। 
      ५. स्वराशि में मङ्गल के साथ पंचमेश और बुध हो, लग्न में राहु और गुलिक हो तब सर्पशाप माना जाता है।
     ६.  राहु मङ्गल की राशि का होकर पंचमस्थ हो साथ ही शुभ दृष्ट हो तब सर्पदोष निर्मित होता है। 
    ७. राहु, गुरु, बुध, सूर्य, मङ्गल शनि पंचमस्थ हों, पंचमेश और लग्नेश बलहीन हों तब सर्पशाप होता है।
    ८. राहु लग्नेशयुत हो, मङ्गल पंचमेश युत हो और पुत्रकारक केतु युत हो तब सर्पशाप से पुत्र नाश होता है।

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