“धार्मिक असहिष्णुता के मूल में है अधूरा ज्ञान व अज्ञानता -- महात्मा दिलेश्वरानंद"
लखीमपुर खीरी Jan 23, 2025 at 03:57 PM , 1272“जय प्रभु सदानन्द जी” “भगवत् कृपा ही केवलम्”
के0के0 शुक्ला
महा नगर प्रयागराज/ लखीमपुर।
सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस द्वारा संस्थापित संस्था सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्त्वावधान में महाकुंभ मेला हरिश्चंद्र चौराहा स्थित शिविर में सत्संग सुनाते हुए महात्मा दिलेश्वरानन्द ने कहा-- धर्म के नाम पर साम्प्रदायिक तनाव एवं टकराव की जो स्थिति आज समाज में दिखाई पड़ती है, उसका मूल कारण है आध-अधूरे एवं मिथ्या-अक्षम और काल्पनिक ज्ञान पद्धति का लागू किया जाना। अतः जब तक भगवान श्री विष्णु जी, भगवान श्री राम जी एवम भगवान श्री कृष्ण जी वाला ही तत्त्वज्ञान अर्थात ‘सम्पूर्ण ज्ञान-विधान’ को धरती पर सैद्धान्तिक, प्रायौगिक और व्यावहारिक तीनों रूपों में प्रभावी से प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया जायेगा तब तक धर्म-नाम सम्प्रदायों में समभाव का होना वैचारिक और भाषणीय व्याख्यान मात्र ही रहेगा ।
इस धरती पर समय-समय पर महापुरुषों, अंशावतारियों, रसूलों-पैगम्बरों, एण्जल्स-प्रॉफेट्स आदि उसी ‘एक’ सर्वोच्च शक्ति-सत्ता रूप खुदा-गॉड-भगवान द्वारा इस धरती पर भेजे जाते रहे हैं जो परिस्थिति के अनुसार जन समाज को उस सर्वोच्च शक्ति-सत्ता के तरफ मोड़ते रहे हैं । उन महापुरुषों द्वारा विभिन्न भाषाओं में एवं विभिन्न समयों में विभिन्न शब्दों से उस एक ही परमपुरुष रूप सर्वोच्च शक्ति-सत्ता को पुकारा जाता रहा है । परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड- भगवान-सत्सीरी अकाल ॐकार-सत्पुरुष-परमपुरुष-अकालपुरुष-बोधिसत्त्व-अरिहंत, यहोवा-अहूरमजदा-कुलमालिक आदि-आदि शब्दों से उसी परमप्रभु रूप सर्वोच्च शक्ति-सत्ता के तरफ इंगित किया जाता है । वह एकमात्र ‘एक’ ही है । प्रॉफेट्स-पैगम्बर-अंशावतारी आदि उसी ‘एक’ का बनने और बने रहने की बातें समाज में रखते हैं किन्तु आज समाज उनके बताये गये विधानों को न अपनाकर उस ‘एक’ खुदा-गॉड-भगवान का न बनकर अपने अगुवाओं का मात्र बनकर अलग-अलग गुट बनाने में लगे हैं । अब यदि वे अपने अपने बडप्पनबाजी में तनाव-टकराव पैदा करते है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है और यदि सरकार भाई-चारा और शान्ति-व्यवस्था लाने में अपने सारे प्रयास को विफल हुआ पा रही हो तो इसमें कोई अनहोनी बात नहीं है ।
यह स्थिति हो गयी है आज के विश्व समाज की,ये सभी जुट गये हैं अपने-अपने बडप्पन और श्रेष्ठत्त्व को उजागर करने में । तनाव, टकराव व संघर्ष या विघटन ऐसे ही बडप्पनबाजी का ही तो परिणाम है।































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