*पारिवारिक विवाद सुलझाने के बजाय मुकदमों में उलझ रहे परिवार*

लखीमपुर खीरी , 6

*छोटी-छोटी कहासुनी को मिल रहा आपराधिक रंग*

पलियाकलां-खीरी। संपत्ति बंटवारे और पारिवारिक विवादों के निस्तारण को लेकर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि आपसी विवादों को बातचीत और सुलह-समझौते से सुलझाने के बजाय कई मामलों में मुकदमा दर्ज कर न्यायालय भेज दिया जाता है, जिससे परिवार वर्षों तक कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने को मजबूर हो जाते हैं।
क्षेत्रवासियों का कहना है कि संपत्ति के बंटवारे को लेकर होने वाली छोटी-छोटी लड़ाई और कहासुनी को भी कई बार आपराधिक मामले का रूप दे दिया जाता है। ऐसे सैकड़ों मामले बताए जा रहे हैं, जिनमें विवाद का स्थायी समाधान कराने के बजाय कानूनी कार्रवाई होने से परिवारों के बीच विवाद और गहरा जाता है।
लोगों का कहना है कि न्यायालयों में पहले से ही हजारों-लाखों मामले लंबित हैं। मुकदमे चलने के दौरान तारीख पर तारीख लगती रहती है और परिवारों का समय व पैसा दोनों बर्बाद होते हैं। हालात यह हैं कि 180 किलोमीटर दूर न्यायालय तक छोटे-छोटे बच्चों को साथ लेकर महिलाओं को भी बार-बार कचहरी के चक्कर लगाने पड़ते हैं। लगातार मुकदमेबाजी और खर्च के चलते कई परिवारों को अपनी संपत्ति तक बेचने की नौबत आने का आरोप है।
एक व्यक्ति का मामूली विवाद, पूरा परिवार भुगतता है खामियाजा
पारिवारिक विवाद में मुकदमा दर्ज होने के बाद उसका असर केवल संबंधित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे परिवार को मानसिक, सामाजिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। लोगों का आरोप है कि बंटवारे से जुड़े मामलों में कभी-कभी 7/16 जैसी कार्रवाई कर मामले को डंडे-बस्ते में डाल दिया जाता है, जिससे विवाद का वास्तविक समाधान नहीं हो पाता और परिवारिक मामला लंबे समय तक चलता रहता है।
क्षेत्रवासियों ने पुलिस और प्रशासन के उच्चाधिकारियों से मांग की है कि ऐसे मामलों को गंभीरता से संज्ञान में लेकर विशेष जांच कराई जाए। जहां मामला गंभीर अपराध का न हो, वहां कानून के दायरे में रहते हुए दोनों पक्षों की काउंसलिंग, मध्यस्थता और आपसी सहमति से समाधान कराने की व्यवस्था की जाए, ताकि पारिवारिक विवाद आपराधिक रूप न लें और टूटते हुए परिवारों को बचाया जा सके।

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