*जर्जर भवन में छात्राओं की जिंदगी पर संकट, हाईकोर्ट सख्त*

लखनऊ , 39

*जर्जर भवन में नहीं चलेगी पढ़ाई - गांधीवादी विरासत ‘चुटकी भंडार’ बालिका इंटर कॉलेज पर हाईकोर्ट का बड़ा हस्तक्षेप*
 

*लखनऊ।* राजधानी के हुसैनगंज स्थित ऐतिहासिक चुटकी भंडार बालिका इंटर कॉलेज से जुड़ा प्रकरण अब छात्राओं की सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही तथा संवैधानिक दायित्वों से संबंधित अत्यंत गंभीर जनमहत्व का विषय बन चुका है। 

लगभग एक शताब्दी पुराने इस ऐतिहासिक बालिका विद्यालय के जर्जर एवं अत्यंत खतरनाक भवन में सैकड़ों छात्राओं की शैक्षणिक गतिविधियां निरंतर संचालित किए जाने के विरुद्ध सामाजिक कार्यकर्ता विजय कुमार पाण्डेय द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ खंडपीठ के समक्ष योजित जनहित याचिका विजय कुमार पाण्डेय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य दाखिल की गई ।
मामले की सुनवाई माननीय न्यायमूर्ति आलोक माथुर एवं माननीय न्यायमूर्ति बृज राज सिंह की खंडपीठ के समक्ष हुई। 

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता वीर राघव चौबे और गिरीश तिवारी ने पक्ष रखा, जबकि प्रतिवादीगण की ओर से मुख्य स्थायी अधिवक्ता के अतिरिक्त अधिवक्ता डी.के. सिंह चौहान, इन्द्र प्रताप सिंह, कृष्ण कुमार पाण्डेय, महेन्द्र बहादुर सिंह, शैलेन्द्र सिंह चौहान एवं विकास सिंह उपस्थित रहे।
माननीय उच्च न्यायालय ने इस मामले को किसी साधारण प्रशासनिक विवाद के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे सीधे तौर पर छात्राओं के जीवन एवं सुरक्षित शिक्षा के संवैधानिक अधिकार से जुड़ा गंभीर प्रश्न माना।

 न्यायालय के पूर्व आदेश के अनुपालन में जिला विद्यालय निरीक्षक, लखनऊ श्री राकेश कुमार तथा लोक निर्माण विभाग, लखनऊ के अधिशासी अभियंता श्री सत्येन्द्र नाथ न्यायालय के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। अधिकारियों की व्यक्तिगत उपस्थिति इस बात का स्पष्ट संकेत थी कि न्यायालय इस प्रकरण में प्रशासनिक जवाबदेही को प्रत्यक्ष रूप से सुनिश्चित करना चाहता है।

सुनवाई के दौरान न्यायालय के समक्ष यह तथ्य प्रस्तुत किया गया कि चुटकी भंडार बालिका इंटर कॉलेज का भवन सौ वर्ष से अधिक पुराना है तथा उसकी स्थिति अत्यंत जर्जर हो चुकी है। जनहित याचिका में यह प्रार्थना की गई थी कि भवन की खतरनाक स्थिति को देखते हुए विद्यालय परिसर में तत्काल प्रभाव से शैक्षणिक गतिविधियां बंद की जाएं तथा छात्राओं को निकटवर्ती सुरक्षित विद्यालयों में स्थानांतरित किया जाए ।

 न्यायालय के निर्देश पर जिला विद्यालय निरीक्षक एवं लोक निर्माण विभाग के अभियंताओं द्वारा विद्यालय भवन का निरीक्षण कराया गया, जिसकी रिपोर्ट 28 अप्रैल 2026 को दाखिल अनुपूरक शपथपत्र के माध्यम से न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई।

 निरीक्षण रिपोर्ट में भवन में अत्यंत गंभीर संरचनात्मक दोष पाए जाने की पुष्टि की गई। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया कि भवन की अधिकांश दीवारों में गंभीर दरारें हैं, छत ईंट निर्मित है तथा भवन की प्रभावी मरम्मत की कोई संभावना नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार सम्पूर्ण भवन छात्राओं एवं कर्मचारियों के लिए असुरक्षित पाया गया।

न्यायालय ने यह भी संज्ञान लिया कि विद्यालय प्रबंधन द्वारा कक्ष संख्या 11, 13, 17 एवं 18 पूर्व में ही बंद की जा चुकी थीं। न्यायालय ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि जब भवन की स्थिति इस प्रकार असुरक्षित पाई गई है, तब अन्य कक्षाओं में भी शैक्षणिक गतिविधियां संचालित किए जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अपने महत्वपूर्ण आदेश में माननीय उच्च न्यायालय ने निर्देशित किया कि एक सप्ताह के भीतर विद्यालय परिसर में समस्त शैक्षणिक गतिविधियां पूर्णतः बंद कराई जाएं । 

न्यायालय ने जिला विद्यालय निरीक्षक को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया कि विद्यालय की सभी छात्राओं को अन्य सुरक्षित एवं उपयुक्त विद्यालयों में स्थानांतरित किया जाए। न्यायालय ने यह भी कहा कि छात्राओं एवं उनके अभिभावकों को पहले अपनी पसंद के वैकल्पिक विद्यालयों में प्रवेश का प्रयास करने की स्वतंत्रता होगी तथा यदि उन्हें प्रवेश प्राप्त करने में कठिनाई हो, तो वे जिला विद्यालय निरीक्षक को आवेदन प्रस्तुत कर सकेंगे। 

ऐसे मामलों में जिला विद्यालय निरीक्षक यह सुनिश्चित करेंगे कि छात्राओं को सुरक्षित शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश उपलब्ध कराया जाए तथा यथासंभव अभिभावकों की प्राथमिकता वाले विद्यालयों को वरीयता दी जाए।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उक्त शिक्षण संस्थान एक राज्य द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त संस्था है, जिसकी शिक्षकों एवं कर्मचारियों के वेतन का भुगतान राज्य सरकार द्वारा किया जाता है। न्यायालय ने निर्देशित किया कि शिक्षकों एवं गैर-शिक्षण कर्मचारियों के सेवा हित, सेवा निरंतरता एवं अन्य वैधानिक लाभों को संरक्षित रखा जाए तथा राज्य सरकार की नीति एवं विधि के अनुसार उनके पुनर्स्थापन की कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

न्यायालय ने विद्यालय प्रबंधन समिति को यह स्वतंत्रता भी प्रदान की कि वह विद्यालय भवन के पुनर्निर्माण हेतु “अलंकार योजना” के अंतर्गत राज्य सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकती है। 

न्यायालय ने कहा कि यदि प्रबंधन समिति विस्तृत भवन योजना एवं निर्माण लागत के साथ कोई आवेदन प्रस्तुत करती है, तो संबंधित सक्षम प्राधिकारी उसे विधि के अनुसार विचारार्थ ग्रहण करेंगे। मामले को 16 जुलाई 2026 को पुनः सूचीबद्ध करते हुए अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। 

साथ ही, न्यायालय ने उस दिन उपस्थित अधिकारियों की व्यक्तिगत उपस्थिति को आगामी आदेश तक के लिए छूट प्रदान की।
यह उल्लेखनीय है कि चुटकी भंडार बालिका इंटर कॉलेज केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन, महिला शिक्षा और सामाजिक चेतना की ऐतिहासिक धरोहर है। इस संस्थान की स्थापना वर्ष 1921 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रेरणा से हुई थी। 

प्रसिद्ध गांधीवादी लेखक रामनाथ सुमन द्वारा लिखित पुस्तक “उत्तर प्रदेश में गांधी” के अनुसार, महात्मा गांधी ने वर्ष 1920 में लखनऊ प्रवास के दौरान महिलाओं से आह्वान किया था कि वे भोजन बनाने से पूर्व “एक चुटकी आटा” स्वतंत्रता सेनानियों के लिए अलग रखें। महिलाओं के इसी योगदान से एकत्र धनराशि से बालिका शिक्षा को समर्पित “चुटकी भंडार स्कूल” की स्थापना की गई, जो समय के साथ विकसित होकर आज चुटकी भंडार बालिका इंटर कॉलेज के रूप में स्थापित हुआ।

याचिकाकर्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता विजय कुमार पाण्डेय ने इस महत्वपूर्ण जनहित याचिका में प्रभावी पैरवी करने वाले अधिवक्ता वीर राघव चौबे के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया।

 उन्होंने कहा कि अधिवक्ता वीर राघव चौबे ने मात्र एक रुपये के सांकेतिक शुल्क पर इस जनहित विषय को लड़ने का दायित्व स्वीकार किया तथा छात्राओं की सुरक्षा और शिक्षा के संवैधानिक अधिकार की रक्षा हेतु अत्यंत समर्पण एवं संवेदनशीलता के साथ न्यायालय में पक्ष रखा।

चुटकी भंडार बालिका इंटर कॉलेज प्रकरण अब केवल एक जर्जर भवन का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह बालिका शिक्षा, विरासत संरक्षण, प्रशासनिक उत्तरदायित्व तथा संवैधानिक मूल्यों की रक्षा से जुड़ा एक ऐतिहासिक जनहित प्रकरण बन चुका है। 

यह मामला स्पष्ट करता है कि जब प्रशासनिक तंत्र अपनी जिम्मेदारियों के निर्वहन में विफल हो जाता है, तब न्यायपालिका नागरिकों विशेषकर छात्राओं के जीवन एवं सुरक्षित शिक्षा के अधिकार की रक्षा हेतु निर्णायक हस्तक्षेप करने के लिए बाध्य होती है।

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