ग्रामीण समृद्धि की सशक्त धुरी: बीसी सखी कार्यक्रम से बदलता उत्तर प्रदेश का सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य
लखनऊ May 06, 2026 at 04:58 PM , 20ग्रामीण समृद्धि की नई पहचान: बीसी सखी कार्यक्रम से सशक्त होता उत्तर प्रदेश
महिला सशक्तिकरण और वित्तीय समावेशन का सशक्त मॉडल: बीसी सखी कार्यक्रम
“एक ग्राम पंचायत–एक बीसी सखी”: गांव-गांव तक बैंकिंग सेवाओं का विस्तार
लखनऊ: 6 मई 2026
उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री श्री केशव प्रसाद मौर्य के नेतृत्व व निर्देशन में प्रदेश में ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण की दिशा में अनेक नवाचार किए जा रहे हैं। इन्हीं प्रयासों के अंतर्गत “बीसी सखी कार्यक्रम” एक अत्यंत प्रभावशाली और दूरगामी पहल के रूप में उभरा है। उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन द्वारा संचालित यह कार्यक्रम न केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रहा है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं की पहुंच को भी अभूतपूर्व रूप से सुदृढ़ कर रहा है। “एक ग्राम पंचायत–एक बीसी सखी” के सिद्धांत पर आधारित यह योजना आज लाखों ग्रामीण परिवारों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रही है।
बीसी सखी (बिजनेस कोरेस्पोंडेंट सखी) कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को वित्तीय सेवाओं से जोड़ते हुए उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। इसके अंतर्गत स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को प्रशिक्षित कर उनके ही गांव में बैंकिंग प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया जाता है। ये सखियाँ ग्रामीणों को उनके घर के निकट ही बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराती हैं, जिससे बैंक शाखाओं तक जाने की आवश्यकता काफी कम हो गई है। यह योजना महिलाओं को रोजगार देने के साथ-साथ उन्हें डिजिटल और वित्तीय साक्षरता से भी सशक्त बना रही है, जिससे वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के साथ समाज में अपनी अलग पहचान स्थापित कर रही हैं।
बीसी सखी कार्यक्रम ने प्रदेश में वित्तीय समावेशन को नई गति दी है। वर्तमान में लगभग 40 हजार बीसी सखियाँ सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं, जो गांव-गांव जाकर बैंकिंग सेवाएं प्रदान कर रही हैं। इनके माध्यम से अब तक 44 हजार करोड़ रुपये से अधिक के वित्तीय लेन-देन किए जा चुके हैं। ये सखियाँ नकद जमा-निकासी, आधार सक्षम भुगतान प्रणाली (AePS) के माध्यम से लेन-देन, बैलेंस जांच, बीमा, पेंशन तथा ऋण पुनर्भुगतान जैसी सेवाएं उपलब्ध करा रही हैं। इस पहल से विशेष रूप से उन क्षेत्रों में बड़ा परिवर्तन आया है, जहां पहले बैंकिंग सुविधाएं सीमित थीं और लोगों को छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी।
यह कार्यक्रम महिला सशक्तिकरण का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा है। इसके अंतर्गत कार्य कर रही महिलाएं आर्थिक रूप से सुदृढ़ होने के साथ सामाजिक रूप से भी सम्मान प्राप्त कर रही हैं। उदाहरणस्वरूप सुल्तानपुर की प्रियंका मौर्य और लखनऊ की अनीता पाल जैसी बीसी सखियाँ प्रतिमाह औसतन 45 हजार रुपये से अधिक का कमीशन अर्जित कर रही हैं, जिससे उनके परिवार के जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। अब तक बीसी सखियों द्वारा 121 करोड़ रुपये से अधिक का कमीशन अर्जित किया जा चुका है, जो इस योजना की सफलता को दर्शाता है।
बीसी सखी कार्यक्रम के तहत कई सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक साझेदार के रूप में जुड़े हुए हैं, जिनमें भारतीय स्टेट बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा सहित अन्य बैंक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। इन बैंकों के सहयोग से ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं का दायरा लगातार बढ़ रहा है। साथ ही, बीसी सखियों को माइक्रो एटीएम, लैपटॉप और स्मार्टफोन जैसे डिजिटल उपकरणों से सशक्त करने की योजना पर कार्य किया जा रहा है, जिससे वे अधिक कुशलता और पारदर्शिता के साथ सेवाएं प्रदान कर सकें।
कार्यक्रम को और प्रभावी बनाने के लिए इसके कार्यक्षेत्र का विस्तार भी किया जा रहा है। बीसी सखियों को जन सुविधा केंद्रों के संचालन, बीमा सेवाओं, आरडी खाता खोलने, ऋण वितरण एवं वसूली तथा डाकघर योजनाओं से जोड़ने की दिशा में विचार चल रहा है। भविष्य में उन्हें आधार अपडेट जैसे कार्यों में शामिल करने पर भी विभाग मे विचार किया जा रहा है, जिससे उनकी भूमिका और अधिक व्यापक होगी और आय के अतिरिक्त अवसर प्राप्त होंगे। बड़ी ग्राम पंचायतों में एक से अधिक बीसी सखियों की नियुक्ति की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है, ताकि सेवाओं की गुणवत्ता और पहुंच को और बेहतर बनाया जा सके।
जनपद स्तर पर इस कार्यक्रम के प्रभावी क्रियान्वयन में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी देखने को मिल रही है। वर्तमान में प्रयागराज प्रथम स्थान पर है, जबकि बरेली और शाहजहांपुर क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। यह प्रतिस्पर्धा कार्यक्रम के बेहतर संचालन को प्रोत्साहित कर रही है।
बीसी सखी कार्यक्रम केवल एक रोजगार योजना नहीं, बल्कि समावेशी विकास का सशक्त माध्यम बन चुका है। यह पहल महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सुदृढ़ कर रही है। इससे जहां महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका मिल रही है, वहीं ग्रामीणों को उनके द्वार पर ही आवश्यक वित्तीय सेवाएं उपलब्ध हो रही हैं, जिससे सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को कम करने में भी सहायता मिल रही है।
उत्तर प्रदेश में यह कार्यक्रम इस बात का उदाहरण है कि प्रभावी रणनीति और सही दिशा में प्रयास किए जाएं तो ग्रामीण क्षेत्रों में भी व्यापक परिवर्तन संभव है। राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन की मिशन निदेशक श्रीमती दीपा रंजन ने बताया कि लक्ष्य यह है कि शीघ्र ही सभी ग्राम पंचायतों में बीसी सखी की नियुक्ति सुनिश्चित की जाए, ताकि “आत्मनिर्भर ग्रामीण महिला–आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश” के संकल्प को साकार किया जा सके। निस्संदेह, यह कार्यक्रम आने वाले समय में ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा।































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