अदभुत गाँव: विधवाओं का गाँव 

परिवेश , 863

अमरेन्द्र सहाय अमर 

भारत एक अदभुत देश है. यहाँ की संस्कृति, पहनावा, खानपान अपने अपने क्षेत्र के हिसाब सेअदभुत है. भारत को गावों का देश कहा जाता है. यहाँ की अधिकतर आबादी गावों में रहती है. आज हम आपको एक ऐसे गाँव के बारे में बताने जा रहे है जिसे जानकार आपको आश्चर्य होगा . जी हाँ एक गाँव विधवाओं का गाँव. इस गाँव को विधवाओं का गाँव कहा जाता है,क्योंकि यहाँ अधिसंख्य संख्या में विधवाएं ही रहती हैं क्योंकि उनके पतियोंकी मृत्यु हो चुकी है या मृत्यु हो जाती है . स्थिति ऐसी है कि पतियों की मृत्यु में के अपने परिवार के आपलं पोषण के लिए विधवा महिलाओं को स्वयं मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार और बल बच्चों का पालन पोषण करना पड़ता है.इस गाँव की ज़्यादातर महिलाएं दिन के दस दस घंटे कठिन परिश्रम करके बलुआपत्थरोंको तोड़ने और उन्हें तराशने का काम करती हैं . मृत्यु क्यों हो जाती है इस पर हम आगे चर्चा करेंगे .
बुधपुरा गाँव की विधवा महिलाओं की जटिल और संघर्ष भरी ज़िन्दगीके बीचा यह प्रश्न उठता है कि इस गाँव के पुरुषों की असमय मृत्यु क्यों होजाती है . असमय मृत्यु के पीछेकई रिपोर्ट्स में यह बताया गया है कि यहाँ के पुरुषो के मृत्यु के पीछे इस गाँव के लोगों का खदान में काम करना है. खदानों में काम करने के कारण यहाँ के लोगों को सिलिकोसिस नामक घातक बीमारी हो जाती है. समय पर सही इलाज न मिलने के कारण यहाँ के लोगों के असमय मृत्यु हो जाती है. गाँव बुधपुरा में बलुआ पत्थरों को तराशने का काम बहुत बड़े पैमाने पर होता है. इस खदानों में स्थानीय रूप से गाँव के श्रमिक ही काम करतेहैं. काम के दौरान यानि पत्थरों को तराशते समय पत्थरों से निकली महीन सिलिका डस्टपुरुषों के फेफड़ों में चली जाती है. डाक्टरों के पास पंहुचने वाले अधिकांश श्रमिकों कोसांस लेने में यानि श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारियां होती है. आप स्वयं सोचिये जब सांस लेने की दिक्कत होगी तो इन्सान कितने दिन तक जी सकता है. इस  बीमारी के गंभीर होने के बाद इलाज का कोई फायदा मिलता है.
अगर सही वक़्त पर इस बीमारी का पता चल जायऔर तो इसका इलाज हो जाता है और कामगारों की जान बच जाती है. परन्तु अधिकतर मामलों इस बीमारी का पता मजदूरों को बहुत देर से पता चलता है और बीमारी लाइलाज हो जाती है .
चौंकानेवाली बात यह है कि इस गाँव की महिलाएं अपने पतियों के मृत्यु होने का कारन जानते हुए भी अपने बच्चो के पालन पोषण के लिए उन्ही खदानों में काम करने को विवश होती हैं. अपने बच्चो को भूख से मरने को बचाने के लिए महिलाएं पत्थर तराशने के जानलेवा काम को करने को विवश हैं. यही नही कभी कभी बच्चे भी अपने परिवार का हाथ बताने के लिए इस काम में लग जाते हैं.
बच्चों  को भूख के कारण मरने से बचाने के लिए अब विधवा महिलाएं भी बलुआ पत्थचर तराशने के जानलेवा काम को करने के लिए विवश हैं. यही नहीं, यहां के बच्चेन भी परिवार का हाथ बंटाने के लिए इसी काम में लग जाते हैं. डॉक्टरों के पास पहुंचने वाले अधिकांश मरीजों को सांस लेने में दिक्कंत या श्वरसन तंत्र से जुड़ी बीमारियां ही ज्यादा होती हैं. हालात इतने खराब हैं कि मरीजों में 50 फीसदी को जांच करने पर सिलिकोसिस बीमारी का पता चलता है. अमूमन मरीज तभी डॉक्टचर्स के पास पहुंचते हैं, जब हालात बेहद खराब हो चुके होते हैं. बीमारी के गंभीर स्टेेज पर पहुंचने के बाद इलाज शुरू होने के कारण मरीजों को ज्यारदा फायदा नहीं मिल पाता है.
इस गाँव में बहुत महिलाएं विधवा हो चुकी हैं, इसलिए इस गाँव को विधवाओं का गाँव कहा जाता है .

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