अदभुत मटके:पत्थर के मटके

परिवेश , 545

असंम में पत्थरों के मटके खुदाई के दौरान मिले हैं  शोधकर्ताओं का अनुमान है कि ये मटके ईसा पूर्व चार सौ साल पुराने हो सकते हैं. नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी के डाक्टर तिलक ठाकुरिया और गुवाहाटी विश्वविद्यालय के उत्तम बाथारी के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की एक टीम ने इनका पता लगाया है. अब तक जो मटके मिले हैं, वे अलग-अलग आकार और स्वरूप में हैं. कोई लंबा कोई बेलनाकार है, तो कुछ जमीन में आधे या पूरे गड़े हुए हैं. यह शोध रिपोर्ट 'जर्नल आफ एशियन आर्कियोलॉजी' के एक  अंक में छप चुकी  है.

इससे पहले लाओस में भी ऐसे पत्थर के मटके मिल चुके हैं. अब तक पक्के तौर पर इसकी जानकारी नहीं है कि इनका क्या इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन शोधकर्ताओं की राय है कि शायद अंतिम संस्कार के दौरान इनका इस्तेमाल किया जाता होगा. डॉ. ठाकुरिया का कहना है कि फिलहाल ये मटके खाली हैं, लेकिन संभव है कि कभी उनके मुंह पर ढक्कन लगा हुआ था.
अब अगला कदम बाकी खुदाई पूरी कर पूरे मामले को सिलसिलेवार तरीके से कलमबद्ध करना है, ताकि संयुक्त राष्ट्र में उनके वर्ल्ड हेरिटेज दर्जे के लिए आवेदन दिया जा सके. इसमें असम सरकार भी सहायता करेगी.  असम में कम-से-कम दस स्थानों पर ऐसे 700 से ज्यादा मटके मिले हैं. अभी वहां ऐसे और मटके जमीन में दबे होने की संभावना है.
वर्ष1928 में पहली बार जेपी मिल्स और जेएस हॉटन ने इनका पता लगाया था. उसके बाद इस दिशा में कोई गंभीर काम नहीं हुआ. करीब 80 साल बाद साल 2014 में मैं डाक्टर ठाकुरिया ने  नागालैंड विश्वविद्यालय के तितोषी जमीर के साथ मिलकर उस स्थान का पता लगाया." जिन स्थानों पर ऐसे मटके मिले हैं, वे असम के डिमा हसाओ जिले में हैं. 2016 में इसी टीम ने वहां जाकर इस मामले को कलमबद्ध किया. डॉ. ठाकुरिया बताते हैं, "गुवाहाटी विश्वविद्यालय के उत्तम बाथारी ने इस मामले को कलमबद्ध किया था. इसके अलावा चार नए स्थानों की तलाश की गई. ये स्थान हैं--हेरोकिलो, लोअर चाइखाम, ताई मोडिलिंग-1 और 2." विशाखापत्तनम के समुद्र तट पर छिड़ा स्वच्छता अभियान, भारी संख्या में लोगों की सफाई फिलहाल 11 जगहों पर ऐसे 700 से ज्यादा मटकों का पता लग चुका है. इनमें से एक ही जगह 500 से ज्यादा मटके मिले हैं. यह विश्व में अकेली ऐसी जगह है, जहां एक साथ इतनी तादाद में मटके मिले हैं. ऐसा लाओस में भी नहीं है. वहां एक स्थान पर ऐसे अधिकतम करीब 350 मटके ही मिले हैं. डॉ. ठाकुरिया बताते हैं कि 2015 में असम सरकार के पुरातत्व विभाग ने डिमा हसाओ जिले के लुंगमाईलाई में ऐसे मटके होने की बात कही थी. वह कहते हैं कि यह प्राचीन काल में शवों के अंतिम संस्कार का हिस्सा हो सकते हैं. पहले लोग शव रखने की जगह को सुरक्षित रखते थे. शोधकर्ताओं का कहना है कि पहले मिट्टी के मटके तो मिलते रहे हैं, लेकिन पत्थर के बने ये मटके अपने आप में अनूठे हैं. ऐसे मटके दुनिया में सिर्फ लाओस और असम में ही हैं. इनका वैश्विक सांस्कृतिक महत्व है. लाओस में तो संयुक्त राष्ट्र ने इनको वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा दे दिया है. अब असम के इन स्थानों को भी उस सूची में शामिल करने का प्रयास चल रहा है. इसके लिए तमाम रिसर्च को कलमबद्ध करने की कवायद शुरू हो गई है. लाओस में कई जगहों पर मटकों के ऊपर ढक्कन भी मिले हैं. लाओस के शियांगखुआंग प्रांत में 90 से अधिक ऐसी जगहें हैं, जहां 400 से अधिक पत्थर के मटके हैं. कई मटकों के ऊपर तो पत्थर के ढक्कन भी मिले हैं. बताया जाता है कि इन मटकों की ऊंचाई एक से तीन मीटर तक है. वियतनाम युद्ध के दौरान वर्ष 1964 से 1973 के बीच अमेरिकी वायु सेना ने शियांगखुआंग प्रांत में 26 करोड़ से अधिक क्लस्टर बम गिराए थे. हालांकि इनमें से कई करोड़ ऐसे थे, जो फटे ही नहीं थे. पत्थरों के मटके वाले कई इलाकों में ऐसे बम आज भी वैसे ही पड़े हुए हैं. हालांकि कुछ जगहों से इन बमों को हटा लिया गया है

फिलहाल 11 जगहों पर ऐसे 700 से ज्यादा मटकों का पता लग चुका है. इनमें से एक ही जगह 500 से ज्यादा मटके मिले हैं. यह विश्व में अकेली ऐसी जगह है, जहां एक साथ इतनी तादाद में मटके मिले हैं. ऐसा लाओस में भी नहीं है. वहां एक स्थान पर ऐसे अधिकतम करीब 350 मटके ही मिले हैं. डॉ. ठाकुरिया बताते हैं कि 2015 में असम सरकार के पुरातत्व विभाग ने डिमा हसाओ जिले के लुंगमाईलाई में ऐसे मटके होने की बात कही थी. वह कहते हैं कि यह प्राचीन काल में शवों के अंतिम संस्कार का हिस्सा हो सकते हैं. पहले लोग शव रखने की जगह को सुरक्षित रखते थे. शोधकर्ताओं का कहना है कि पहले मिट्टी के मटके तो मिलते रहे हैं, लेकिन पत्थर के बने ये मटके अपने आप में अनूठे हैं. ऐसे मटके दुनिया में सिर्फ लाओस और असम में ही हैं. इनका वैश्विक सांस्कृतिक महत्व है. लाओस में तो संयुक्त राष्ट्र ने इनको वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा दे दिया है. अब असम के इन स्थानों को भी उस सूची में शामिल करने का प्रयास चल रहा है. इसके लिए तमाम रिसर्च को कलमबद्ध करने की कवायद शुरू हो गई है.

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