भारत की संसद के बारे क्या आप जानते हैं...??

जनपत की खबर , 671

कि हमारी संसद खुद को कन्वीन नही करती यह कब बैठेगी, कितनी देर बैठेगी, और कब सत्र का अवसान हो जाएगा, यह सरकार तय करती है।

अमेरिकन संसद को 150 दिन बैठना जरूरी है, लेकिन कम से कम 120 दिन बैठना जरूरी है ब्रिटेन की संसद साल भर बैठती है भारत कोई स्थिर कैलेण्डर नहीं। 

बजट सत्र सबसे लम्बा होता था, जो तीन चार माह तक चलता अब बजट पास करवाकर, झटपट खत्म हो जाता है मानूसन सत्र तीन हफते का होता है, और शीत सत्र महज 3-4 हफते का ... 

असल मे संसद बनी ही है, सरकार पर नियंत्रण करने के लिए लेकिन जब इसकी बैठक तय करने की ताकत सरकार के पास है तो चर्चा से डरने वाली सरकार के चाहती है कि संसद कम से कम दिनों के लिए चले।  

संसद का ऐजेण्डा, वहां किस विषय पर बात होगी, इसका प्रस्ताव सरकार देती है, क्योकि उसे कानून लाने है, पास करवाने है स्पीकर, एजेण्डा तय करता है

लेकिन विपक्ष जनहित के मुद्दो पर कोई ध्यानाकर्षण या स्थगन मांगकर चर्चा चाहता है, तो स्पीकर स्थान देता है इस तरह संसद का सत्र खिंचता है बताने की बात नही कि आजकल स्पीकर सिर्फ सरकारी मुद्दो को ऐजेण्डा मे लेते है चर्चा का विषय बनाते है। 

विपक्ष के मुद्दे स्वीकार नही करते सो नोटबन्दी, महंगाई, बेराजगारी, घोटाले या किसी तात्कालिक महत्व के विषय को ऐजेण्डा मे लिया ही नही जाता। 
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जनता को लगता है कि विपक्ष तो मुद्दे ही नही उठा रहा।
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पेगासस और रफेल पर विपक्ष सर पटक कर रह गया, लेकिन यह ऐजेण्डा मे शामिल नही हुआ। 

चीन के हमले पर छह माह नेहरू संसद मे अपमान झेलते रहे, लेकिन ऐजेण्डा से विषय हटाने नही दिया। 

आज दो साल से चीन के अतिक्रमण के मुद्दे पर चर्चा ही नही हुई इसे स्पीकर ने ऐजेण्डा मे लिया ही नही।  

ब्रिटेन की संसद मे, कुल समय का 20 % दिनों का ऐजेण्डा विपक्ष को तय करने का अधिकार है वहां हमारे प्रश्नकाल की तरह, ब्रिटेन मे "प्रधानमंत्री प्रश्नकाल" (PMQ) होता है। 

क्या भारत मे प्रधानमंत्री संसद मे 1 घण्टे खड़े होकर सांसदों के प्रष्नों का जवाब देने को मजबूर किये जा सकते है? एक भी प्रेस कान्फ्रेस न करने करने वाला शेर, किसी सांसद को बताए कि क्या अब रूपये के साथ प्रधानमंत्री की इज्जत क्यो नही गिर रही?

ऐसे मे हंगामा और शोरगुल करने के अलावे विपक्ष के पास कोई रास्ता नही है इसमे सत्र का समयऔर जाया होता है अब तो शोरगुल करने पर सीधे निलंबन की नई परीपाटी आ गई है। 

तो सांसद आए, सरकार के बिल पास करे, और चुपचाप घर जाए विपक्ष हल्ला न करे, तो सत्ता पक्ष ही खुद किसी मुद्दे पर बकवास करके समय खराब करता है। 

सांसद, पार्लियामेण्ट मे आम जनता का प्रतिनिधि बनकर जाता है, उसकी आवाज उठाने लेकिन वहां, वह पार्टी के नेता का गुमाश्ता बनकर चिल्ला चोट करने के लिए मजबूर है। 

क्येाकि दल बदल कानून ने सांसदो का पार्टी की भेड़ बनाकर रख दिया है। 

वे पार्टी मत से अलग बात कह नही सकते, वोट नही कर सकते नेता को अपनी पार्टी के सांसदों को भी राष्ट्रीय महत्व के निर्णयों पर समझाने, सहमत करने, या राय लेने की की जरूरत नही उसे सिर्फ व्हिप का डंडा चलाना है। 

अविश्वास प्रस्ताव के विषय को छोड़कर बाकी विषयों पर सांसद को अपने विचार के आधार वोटिंग की आजादी हो, तो अग्निपथ, नोटबन्दी, निजीकरण, किसान बिल जैसे एकतरफा बिल खुद भाजपा के सांसद पास न होने दें। 

टेलिविजन ने संसद को और बरबाद किया है संसदीय, कानूनी, प्रशासनिक मसलो पर गंभीर चर्चा की बजाए अब संसदीय व्यक्तव्य टीवी पर चमकने का मौका हो गया है। 

नाटकीय अभिनय के साथ संवाद अदायगी अब जनता की निगाह मे आने का तरीका है उठाया गया प्रश्न, उसका कन्टेण्ट, महत्व आमजन को इंट्रेस्टिंग नही लगता, नाटकबाजी आपको वाइरल करती है। 

सांसद, संसद के मच पर सोशल मीडिया के दर्शकों के लिए अभिनय कर रहा है और आप इस रबर स्टाम्प संसद, उसके चाभी से चलने वाले सांसदों से आशा करते है, कि वह आपके संसदीय क्षेत्र की आम जनता की आवाज उठाएगा??  

इसलिए पूछा भारत की के बारे क्या आप जानते हैं...??..साभार.

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