अदभुत झील : कंकालों वाली रूपकुंड झील

परिवेश , 982

समुद्र तल से 5000 मीटर की उंचाई पर है रूपकुंड झील. उत्तराखंड के हिमालयन क्षेत्र में. इसे कंकालों वाली झील भी कहा जाता है. क्योंकि इसके आस पास कई कंकाल बिखरे हुए हैं. कहानियां कई हैं. एक दंतकथा बताती है कि राजा और रानी की कहानी, सदियों पुरानी. इस झील के पास ही नंदा देवी का मंदिर है. पहाड़ों की देवी. उनके दर्शन के लिए एक राजा और रानी ने पहाड़ चढ़ने की ठानी. लेकिन वो अकेले नहीं गए. अपने साथ लाव-लश्कर ले कर गए. रास्ते भर धमा-चौकड़ी मचाई. राग-रंग में डूबे हुए सफ़र तय किया. ये देख देवी गुस्सा हो गईं. उनका क्रोध बिजली बनकर उन पर गिरा. और वो वहीं मौत के मुंह में समा गए.
कहने वाले ये भी कहते हैं कि ये किसी महामारी के शिकार लोग थे. कुछ लोग कहते थे ये आर्मी वाले लोग हैं जो बर्फ के तूफ़ान में फंस गए. कुछ  लोगों का मानना था कि ये अस्थियां कश्मीर के जनरल जोरावर सिंह और उनके आदमियों की हैं. जो 1841 में तिब्बत के युद्ध से लौट रहे थे. 1942 में पहली बार एक ब्रिटिश फॉरेस्ट गार्ड को ये कंकाल दिखे थे, उस समय ये माना गया था कि ये जापानी सैनिकों के कंकाल हैं जो द्वितीय विश्व युद्ध में वहां के रास्ते जा रहे थे और वहीं फंस कर रह गए. पहले माना गया था कि इन कंकालों में एक समूह एक परिवार का था, दूसरा कद में मझोले लोगों का. लेकिन अब पता चला है. भारत, ग्रीस, और साउथ ईस्ट एशिया के लोगों के कंकाल इनमें शामिल हैं. ये कैसे पता चला? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक स्टडी की गई. इन कंकालों की. उसकी रिपोर्ट अब छपी है. रिपोर्ट में पता चला है कि आखिर इन कंकालों का इतिहास क्या है. नेचर कम्यूनिकेशंस पोर्टल पर ये स्टडी छपी है. इस स्टडी को करने वालों में भारत के लोग भी शामिल थे. इस छान बीन और स्टडी के अनुसार  71 कंकालों के टेस्ट हुए. इनमें से कुछ की कार्बन डेटिंग हुई. कुछ का डीएनए जांचा गया. कार्बन डेटिंग एक टेस्ट है जिससे पता चलता है कि कोई भी अवशेष कितना पुराना है. इनकी अभी तक जांच नहीं हुई थी. इसलिए क्योंकि एक तो जिस जगह ये झील है वहां के रास्ते में और आस-पास लैंडस्लाइड बहुत होती हैं. दूसरा यहां जितने कंकाल थे, उनमें से कई के हिस्से लोग उठा ले गए हैं. पता चला कि ये सब कंकाल एक समय के नहीं हैं. अलग-अलग टाइम पीरियड के हैं. अलग-अलग नस्लों के हैं. इनमें महिलाओं और पुरुषों दोनों के कंकाल पाए गए. अधिकतर जो कंकाल मिले, उन पर की गई रीसर्च से पता चला कि जिन व्यक्तियों के ये कंकाल थे, वे अधिकतर स्वस्थ ही रहे होंगे. यह भी जांचा गया कि इन कंकालों में आपस में कोई सम्बन्ध तो नहीं था. क्योंकि पहले साइंटिस्ट्स ने इनमें से एक समूह को एक परिवार का माना था. रीसर्च में मिले डेटा से ये बात साफ़ हुई कि ये लोग परिवारों का हिस्सा नहीं रहे होंगे. क्योंकि इनके डीएनए के बीच कोई भी समानता वाला कारक नहीं मिला. जांच में इन कंकालों में कोई बैक्टीरिया या बीमारी पैदा करने वाले कीटाणुओं के अवशेष नहीं मिले. इसका मतलब ये कि चांसेज काफी हैं कि इनकी मौत की महामारी की वजह से भी नहीं हुई थी. हालांकि इसको लेकर ध्यान रखने वाली एक बात है. इतने समय बाद अगर किसी बीमारी फैलाने वाले कीटाणु या विषाणु के अवशेष नहीं मिले, तो इसका मतलब ये भी हो सकता है कि उनकी मौजूदगी बहुत कम मात्रा में रही हो. और अब ट्रेस न हो रही हो.इनमें से अधिकतर भारत और उसके आस-पास के देशों के कंकाल हैं. इन्हें साउथ ईस्ट एशिया के समूह में रखा गया. कुछ इनमें से ग्रीस के इलाके की तरफ के पाए गए. एक कंकाल चीन की तरफ के इलाके का भी बताया जा रहा है. # ये सभी कंकाल एक साथ एक समय पर वहां इकठ्ठा नहीं हुए. जो भारत और आस-पास के इलाकों वाले कंकाल हैं, वो सातवीं से दसवीं शताब्दी के बीच वहां पहुंचे थे, और जो ग्रीस और आस-पास के इलाके वाले कंकाल हैं, वो सत्रहवीं से बीसवीं शताब्दी के बीच वहां पहुंचे. जो कंकाल चीन के आस-पास का बताया गया, वो भी बाद के ही समय में वहां पहुंचा था.
इससे ये पता चलता है कि वहां मिले कंकाल दो अलग अलग हादसों में मरने वाले लोगों के हैं. वो हादसे क्या थे, जिनमें ये लोग मरे, उसे लेकर अभी भी एकमत होकर कुछ कहा नहीं जा सकता. कुछ कंकालों की हड्डियों में ऐसे फ्रैक्चर पाए गए जो गिरने-पड़ने, चोट खाने से लगते हैं. इससे अंदाज़ा ये भी लगाया गया कि शायद ये लोग किसी तूफ़ान में फंसे थे. भयंकर अंधड़ में. ओले भी गिरे होंगे इसमें. लेकिन वो भी एक थ्योरी ही है. रूपकुंड के कंकालों को लेकर जो कहानियां चली हैं, वो दंतकथाओं में शामिल हो चुकी हैं. लोककथाओं का हिस्सा बन चुकी हैं. इन कंकालों पर की गई स्टडी चाहे जो कुछ भी बताती हो, रूपकुंड का ‘कंकालों वाली झील’ नाम आने वाले काफी समय तक उसके साथ बना रहेगा.

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