भूसे के ढेर में चिंगारी क्या लगा पाएगा सरकारी कर्मचारी

हेडलाइंस , 1281

रीना..
पुरानी पेंशन बहाली की लड़ाई विभिन्न संगठनों द्वारा विभिन्न स्तर पर की जा रही है। लगभग दर्जनभर संगठनों ने लखनऊ में धरना प्रदर्शन किया ,अभी विभिन्न रंगों में जारी भी है।
      चुनावी वर्ष है विभिन्न राजनीतिक पार्टियां अपने घोषणापत्र में निजी करण ना करने और पुरानी पेंशन बहाल करने जैसी बातों को स्थान दे पाए और विभिन्न संगठनों द्वारा किए गए धरने प्रदर्शन का परिणाम निश्चित रूप से पेंशन तो दिला नहीं पाएगा पर क्या इतनी ताकत भी नहीं रखता की चुनावी लहर में पार्टियों का मुद्दा बन सके? 
         हम अक्सर बात किसान आंदोलन की सफलता की करते हैं पर बहुत याद करने के बाद भी किसी संगठन का नाम याद नहीं आता याद आता है तो सिर्फ और सिर्फ किसान आंदोलन।.......
           इस नंबर महीने में सियासी गहमागहमी और सरकार के विभिन्न घोषणाओं के बीच कर्मचारियों के विभिन्न मुद्दे पर क्या एक भी घोषणा हुई?
            वैसे आप सभी मंथन करते ही होंगे पर मुझे लगता है पत्थर को गिरने से गुस्से में भी आग नहीं लगाई जा सकती आधुनिकता के युग में जब तक हम कर्मचारी आंदोलन ही बनेंगे तब तक पक्ष या विपक्ष के चुनावी घोषणा पत्र में हमें स्थान नहीं दिया जाएगा।
          कर्मचारियों की मांगों की लिस्ट बहुत लंबी है अक्सर मैंने देखा है विभिन्न संगठनों के धरने और प्रदर्शन के बाद जो ज्ञापन दिया जाता है वह 12 सूत्री 16 सूत्री और 51 सूत्री से कम नहीं होता।वाकई सोचकर यकीन नहीं होता कि क्या वाकई कर्मचारियों के लिए पिछले 5 साल में कुछ नहीं किया गया... जो मांगो की लिस्ट एक नंबर भी नहीं कम ना हुई।
        क्या विभिन्न विभागों पद और प्रतिष्ठा में बैठे हुए कर्मचारी कभी एक बैनर के नीचे आकर सिर्फ और सिर्फ *कर्मचारी आंदोलन* के नाम से एकजुट नहीं हो पाएंगे............ सभी कर्मचारी फिर वह शिक्षा विभाग , चिकित्सा विभाग,राजस्व विभाग, बैंकिंग सेक्टर , पीडब्ल्यूडी , सिंचाई, बिजली जैसी आकस्मिक सेवा के संगठित और असंगठित कर्मचारी इत्यादि इत्यादि ..... निजीकरण और पुरानी पेंशन जैसे जहरीले सांपों के दंश को झेल रहे हैं बस किसी को यह जहर कम मात्रा में पीना है तो किसी को ज्यादा लेकिन बारी सबकी आएगी कोई भी सुरक्षित है यह कल्पना करना हास्यास्पद है।
       कर्मचारियों को डर से बाहर निकलना होगा और सिर्फ मुख्य मुद्दों को लेकर एक बार एकजुट होकर सड़क पर उतरना चाहिए। दर्जनों भर से ज्यादा मांगों को अपने मांग पत्र से हटाकर सिर्फ एक मांग के लिए एकजुट होना चाहिए वह है *पुरानी पेंशन बहाली और विभिन्न विभागों में किए जा रहे निजी करण की समाप्ति*।
         माना हम सरकारी कर्मचारी हैं कहीं ना कहीं गुलाम की मानसिकता से ग्रसित भी है और अपने मालिक के प्रति वफादार भी। पर हमारी मालिक सरकारें जब हमारे विश्वास ईमानदारी और देश के प्रति जुड़ाव की भावना को निजी हाथों में बेचकर हमारे विश्वास को हमारे परिवारों के विश्वास को नीलाम करने पर आतुर है तो फिर हम सब मिलकर इस शोषण के  प्रति प्रतिकार के लिए एकजुट क्यों नहीं हो सकते????
   सभी के मन में शायद एकजुटता का भाव है अभी पर दिखावे में चंदे और बैनर की लड़ाई में झूठे घमंड और सिर्फ खुद को दिखाने की चाहत में एकजुट नहीं हो पा रहे हैं। प्रदेश में रेलवे का सबसे बड़ा संगठन और सबसे ज्यादा कर्मचारी लगभग 14 लाख हर रोज बेरोजगार होने के लिए घूम रहे हैं। जनता की गाढ़ी कमाई  से बड़े हुए प्रतिष्ठानों को कौड़ियों के भाव या कहें शायद कौड़ी के भाव भी नहीं, उसके नीचे भी कोई मोल हो तो उसके भाव बेच कर प्रतिष्ठित उद्योगपतियों को तोहफे के रूप में दिया जा रहा है। यह आप और हम सभी जानते हैं कि दिए गिफ्ट रूपी कर्मचारी गुलामों से भी बदतर हो जाएंगे, निजी हाथों के कठपुतली के सिवा कुछ नहीं , जब मर्जी हो कूड़े के ढेर में, फिर तोहफो की कीमत सब नहीं समझते।
           साउथ अफ्रीका की गिरमिटिया प्रथा हो या देश ईस्ट इंडिया कंपनी की गुलामी में जकड़ा हो... वैसा ही आज का कर्मचारी बेबस हो गया है! वाकई आज जरूरत है उस जर्जर काया वाले महामानव रुपी  एक मीटर कपड़े में लिपटे हुए महात्मा गांधी की जो पूरे देश को एक आंदोलन एक धुरी और एक दिशा में बांध सके। भले ही हम एहसान फरामोश लोग व्हाट्सएप की आंधी दुनिया में फंसे हुए गांधीजी को गालियां देते हुए पाए जाते हैं आप करें यदि गांधी जी ना होते......... तो भी क्या भारत के इतिहास में असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो जैसे आंदोलन लिखे जाते....... और गुलाम भी कभी संगठित हो सकते हैं यह संदेश देश ही नहीं विदेशों में रिसर्च का विषय बन पाता. निश्चित रूप से आप का जवाब ना ही होगा।

       यकीन आप सब समय रहते एकजुट होकर अपने बीच से ऐसा योद्धा खोज निकालेंगे । जिसकी दूरदर्शिता मीडिया कवरेज और योजनाबद्ध देता के सभी कर्मचारी कायल हो....ताकि योजनाबद्ध तरीके से विभिन्न कर्मचारियों के मुद्दों को एक दिशा मिल सके एक स्पष्ट योजना हो और चरणबद्ध तरीके से लड़कर हम सही दिशा में चल सके।....... और सभी कह सकें कि यदि वह किसान आंदोलन था तो यह कर्मचारी आंदोलन है।

         अपने जीवन का बहुमूल्य समय सरकार को देने वाले निरीह कर्मचारी जब साठ साल के बाद घर जाएंगे तो शायद उन्हें इतनी पेंशन भी नहीं मिलेगी कि वह अपने बुढ़ापे की लाठी भी खरीद सके। यह दर्द अभी कम हुआ भी नहीं था कि निजीकरण के नाम पर परिसंपत्तियों और विभागों को अदानी, अंबानी जैसे बड़े उद्योगपतियों के हाथों में बेचने का सिलसिला शुरू हो गया। और फिर चरणबद्ध तरीके से देश वासियों और कर्मचारियों को गुलाम बनाने का एक कुचक्र बहुत ही मीठी  देश भक्ति के नाम परशुरू कर दिया गया है और आरोप भी बहुत ही आम है कि *कर्मचारी काम ही नहीं करते और सरकार व्यापार नहीं करती*वैसे सोचने की बात यह है कि चाहे बीएसएनएल के फोन हो या हवाई जहाज की यात्रा क्या यह सब सरकारी कर्मचारी करता है, देश के पास धन नहीं है संपत्ति नहीं है फिर भी करोड़ों लोगों को मुफ्त राशन क्या सरकारी कर्मचारी इस मुफ्त राशन की दौड़ में भी आता है..... आप कहेंगे नहीं..... तो फिर हम विभागों की बदहाली का कारण क्यों बनाए जाते रहेंगे।
         मुफ्तखोरी की आदत नेताओं को है  इसलिए क्यों ना इस पूरे देश और मैन पावर को उन कुशल व्यापारियों के हाथ में दे दिया जाए जो एशिया और यूरोप में भारत को विकासशील की कैटेगरी से निकालकर विकसित की कैटेगरी में ला खड़ा करेंगे और नेताओं को  सुख सुविधाएं दे सकेंगे।वाकई सोचकर भी हास्यास्पद लगता है...…........
         कोवीड महामारी में हमने देश के उन बड़े व्यापारियों की हकीकत भी देख ली और निजी करण के नाम पर बने बड़े-बड़े अस्पतालों की कारगुजारी भी। देश और जनता के काम आई यही सरकारी विभाग।
          क्या वाकई हमारे वर्तमान मालिक सरकारी कर्मचारियों का हित सोच रही हैं कम से कम यूपी में डीए की घोषणा कब हो गई और कब मिल गया पता नहीं? उत्तर प्रदेश में 6–6 वेतन भत्ते एक सेकंड में खत्म कर दिए गए और कोई अफसोस नहीं...... महामारी के नाम पर लाखों कर्मचारियों का 1 दिन का वेतन काटा चलिए कोई बात नहीं पर डेढ़ साल का डी ए लेकर .........      अक्सर सरकारी नुमाइंदे यह बताते हुए पाए जाते हैं कि कोई महंगाई नहीं हुई ,पेट्रोल नहीं बढ़ा, गैस नहीं बढ़ी, सब कुछ सामान्य तरीके से चल रहा है इसलिए कर्मचारियों को महंगाई भत्ते की जरूरत भी क्या है।   
        संगठनों के निजीकरण का सबसे बड़ा खामियाजा महिला कर्मचारियों को ही भोगना होगा यह सर्वविदित है मानसिक शारीरिक शोषण का शिकार अक्सर महिला कर्मचारी बना करेंगे इन व्यापारी रूपी भेड़ियों के चंगुल की। कल एक महिला कर्मचारी जो कि बैंक में कार्यरत हैं उनकी व्यथा सुनकर वाकई मन दुखी हो गया उन्होंने बताया पहले वह रिलायंस की एक कंपनी में काम करती थी वह प्रेग्नेंट थी और अधिकारियों द्वारा इतना मानसिक दबाव बनाया गया कि उन्हें इस्तीफा देना पड़ा वह भी इसलिए कि कहीं मेटरनिटी लीव ना देनी पड़े। यह तो शोषण का एक उदाहरण है ऐसे भी ना जाने कितने आगे हमें देखने को मिलेंगे...............
        कोविड जैसी महामारी अपने चरण बद्ध तरीके से देश की जनता के ऊपर कब आक्रमण कर दे पता नहीं उस पर भी कर्मचारी की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी के ऊपर नहीं सरकार को अपने ही कर्मचारी के जाने के बाद उसे मुआवजा देने में शर्म महसूस होती है उसके परिवार को संरक्षण देने में शर्म महसूस होती है घोषणाएं तो रोज ही फाइलों में होती है पर क्या वास्तविक रुप से किसी भी परिवार को पचास लाख़ का मुआवजा मिल पाया?न जाने कितनों ने अपनों को बिना कफन और बिना दर्शन के विदा किया। विषम परिस्थितियों में कर्मचारी लड़ते रहे और सरकार का साथ देते रहे वह भी बिना सुरक्षा....
     इसलिए हम सब को विचार करना होगा कि कब तक हम मीठी गोलियां खाकर खुद को भुलावे में रखते रहेंगे *पुरानी पेंशन नहीं तो वोट नहीं का नारा हम क्यों नहीं लगा पाते*
क्यों कर्मचारी यह कहते हुए पाए जाते हैं कि विकल्प क्या है???
  क्यों कर्मचारी एकजुट होकर खुद के स्वरों को वोटों में तब्दील नहीं कर पाता।
           किसानों की पूछ है क्योंकि सरकारों को डर है की मुट्ठी भर किसान है उनके वोट बैंक को बदलने की ताकत रखता है। पर यह ताकत दिखाने में अन्नदाता को अपने दिन हफ्ते नहीं कई महीने सड़कों पर सोना पड़ा। विभिन्न प्रकार के आरोपों और प्रत्यारोपण को सहना पड़ा।
          सोचने की बात है  हम एक विभाग के होकर भी एक यूनियन नहीं बना पा रहे और ना ही एकजुट होकर उस सरकार का विरोध कर पा रहे जो हमारे ही पैरों में मोटी मोटी जंजीरे डालकर कभी धारा 144 के नाम पर तो कभी देशद्रोह के अन्य कानूनों के नाम पर आंदोलन करने से हमें रोकते हैं  तो कभी विभिन्न संगठनों से उनकी मांगों का पत्र मांगकर अपनीजिम्मेदारियों की इतिश्री समझ लेते हैं ।
       यह सब इसलिए कि सरकारें जानती हैं कर्मचारियों के हित में चाहे कुछ भी कर लिया जाए पर वह वोट उन्हें ही देंगे।...... ठीक है वोट देना एक पर्सनल मुद्दा है पर क्या मिलकर हम सामूहिक रूप से लाखों की संख्या के वोट बैंक हैं और हमारे परिवारों के सदस्यों को जोड़ दिया जाए तो शायद हमारी संख्या करोड़ों में है यह हम सरकार को नहीं बता सकते???? हमारे स्वरों की भी कीमत है इस लोकतंत्र में यह बताना ही होगा।
        निश्चित रूप से बता सकते हैंअपनी ताकत यदि सभी संगठन एकजुट हो कम से कम विभागों में चल रहे विभिन्न गुटों को समाप्त करके एक गुट बन पुरानी पेंशन को विभिन्न राजनीतिक पार्टियों का चुनावी मुद्दा और घोषणा पत्र में स्थान दिया जाए।
   अफसोस जनक है कि देश में व्यापार करने वाला व्यापारी तो सरकार की नजर में पेंशन का हकदार है पर अपना पूरा जीवन देकर नियम और कानूनों में बंधा रहने वाला सरकारी कर्मचारी नहीं.............     
       जब तक एक बैनर ना बने एक दिशा न हो तब तक कर्मचारी शिक्षक और अधिकारियों को मूर्ख बनाना अब बंद कर देना चाहिए। और समय के साथ छोटी छोटी नौकाओं में जाने से अच्छा है एक बड़े जहाज का सफर किया जाए *क्या अब समय नहीं आ गया है सभी विचार करें कि किस तरह हम कर्मचारी आंदोलन बने*?
       हम सबको मिलकर वह स्तर तय करना होगा कि हमारी घोषणा करने के लिए भी एक दिन टीवी पर प्रधानमंत्री जी आए और कहें कि देश को जरूरत है और उन्हें अहमियत है अपने कर्मचारियों की............
सोचे और विचार करें।
*क्यों हम चुनावी समय में भी भूसे में आग नहीं लगा पा रहे हैं*???
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@कर्मचारी की मांग

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