काम की प्रवृत्ति _

परिवेश , 545

कामदेव का संक्षिप्त विश्लेषण करना भी अति आवश्यक है नहीं तो लोगों में भ्रांतियाँ उपजती रहेंगी। कामदेव ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश और सुरेश इन चारों पर विजय पा रखी है जब भगवान् कामदेव ने अपने से समतुल्य एवं उच्चाधीन ईश्वर को ही अपने वश में करके रखा हो, तब और किसी की क्या बात की जाए.. सारांश यह है कि भगवान् कामदेव सबसे अधिक बलवान् हैं : ]

कामदेव का शस्त्र भी अजीब है, जैसे फूलों का बाण हो, पूर्ण योगी, सन्यासी तक इस बाणों से नही बच सके। जो ब्रह्म से लड़ने निकले थे, वह कामदेव के आगे ढेर हो गए..!!

काम संभोग-वृत्ति निर्लिप्त नहीं, लेकिन त्याज्य भी नहीं। यहाँ प्रवृत्ति, निवृत्ति आदि का कोई प्रश्न नहीं। इस महादेश में कामवासना पर वृहद ग्रंथ रचे गये हैं। मनीषियों ने काम को पुरुषार्थ-चतुष्टय का हिस्सा अकारण नहीं माना। उसका प्रातिस्विक वैशिष्ट्य है। लेकिन काम-भावनाएँ अवगुंठवती रहीं। समाज की संरचना में 'काम' गार्हस्थ्य-संपृक्ति के इतर कुछ नहीं। इस उदात्त मूल्य के प्रति समाज की दृष्टि इतनी संकीर्ण क्यों ? - यह विवेच्य है। 

अस्ल में काम बाज़ार से खरीदी कोई वस्तु नहीं। वह प्रकृति प्रदत्त है। उसकी नैसर्गिकता के प्रति समाज की हेयता समझ से बाहर है। 

काम धर्म से संचालित होना चाहिए, ऐसा मुझे आवश्यक नहीं लगता। निर्वसना देह के प्रति काम जागना स्वाभाविक है। हां, धर्म है पहले मन का बँधना फिर देह का ... लेकिन ऐसा न हो तब भी यह अधर्म क्योंकर हुआ ? 

विवाह-पूर्व या विवाहेतर सम्बन्धों की छूट समाज नहीं देता। लेकिन कोई ऐसा करे तो समाज का नियम टूटता है, प्रकृति का नहीं। मनुष्य का उत्तरदायित्व समाज के प्रति अधिक है या प्रकृति के प्रति ? यह सोचने वाली बात तो है। 

मनुष्य इसको लेकर सहज नहीं, लेकिन पशु है - ऐसा ओशो ने कहा तो ग़लत कुछ नहीं कहा। मनुष्य सभ्य होने के साथ साथ संकीर्ण भी होता गया अनायास ही। हमारी सभ्यता-ग्रंथि भी ग़ज़ब है। 

निर्वसना चर्म-सौष्ठव समक्ष हो तो विश्वामित्र जैसे तापस भी मतिभ्रष्ट हो जाते हैं। यहाँ यह देखना दिलचस्प है कि साधना के लिए यह काम क्रिया त्याज्य क्यों ... ? ख़ैर उसका अपना विधान होगा लेकिन साधारण मनुष्यों में इसके प्रति इतने पूर्वाग्रह क्यों ?? 

काम उन्मुक्त करता है, प्रयोगधर्मी मित्र जानते हैं। जो सामाजिक हैं, जिन्हें समाज की कल्पित अराजकता व्यथित करती है, वे कमरे से बाहर आकर चुप हो जाते हैं। उनका समग्र पराक्रम पर्यंक तक ही सीमित है, निर्गमन अपराध सा लगता है उन्हें। 

इस बात को लेकर कवियों ने भी पर्याप्त कचरा फैलाया है। देह को घृणा से देखते हैं कविता में ( यह विलग बात कि ललित कलाविदों की मानसिक वृत्तियाँ सर्वाधिक काममय होतीं हैं ) .... क्यों है ऐसा ? हाँ, अय्याशी को छोड़िए। लेकिन संभोग प्रेम का बाई प्रोडक्ट है। जब प्रेम पावन है तो उसी के उत्पाद से इतनी जुगुप्सा क्यों ? मन मिलने पर काम-संचरण बहुत सम्भव है ...

धर्म और शारीरिक आवश्यकता - ये दो बातें हैं। गृहस्थ के लिए पितृऋण से मुक्ति का उपक्रम है संभोग ... हम भारतीय सात्विक-उपयोगिता के पक्षधर हैं। ऐसे में परगमन कुत्सित समझा गया। और इसे धर्म से जोड़ा। सही भी है, एक महत्वपूर्ण कारक का उपयोगी-अभिनिवेश ज़रूरी भी है। लेकिन कोई शारीरिक आवश्यकता से प्रेरित होकर सम्भोग करता है तब भी क्या आपत्ति ... ? 

काम जितना धर्म सम्बद्ध है उतना ही आनंदसिक्त भी। ऐसे में कोई तर्कणा अकारथ ही है।


प्रफुल्ल सिंह "बेचैन कलम"
युवा लेखक/स्तंभकार/साहित्यकार
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
सचलभाष/व्हाट्सअप : 6392189466
ईमेल : prafulsingh90@gmail.com

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