जजों की नियुक्ति में सरकार का दखल, न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल
जनपत की खबर Oct 28, 2026 at 06:01 AM , 14भारतीय संविधान में शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है। इसके तहत विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को अलग-अलग दायित्व सौंपे गए हैं, ताकि कोई भी संस्था निरंकुश न हो सके। न्यायपालिका की स्वतंत्रता इसी व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने विभिन्न निर्णयों में इसे संविधान के मूलभूत ढांचे का अंग माना है। इसी अवधारणा के आधार पर 1993 और 1998 के ऐतिहासिक फैसलों के बाद उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली विकसित हुई। हालांकि, इस व्यवस्था को लेकर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं। आलोचकों का तर्क है कि इससे न्यायाधीशों की नियुक्ति में निर्वाचित सरकार और संसद की भूमिका सीमित हो गई है, जबकि समर्थकों का मानना है कि इससे न्यायपालिका को राजनीतिक दबाव से बचाने में मदद मिलती है।
भारत में कॉलेजियम प्रणाली को लेकर बहस केवल नियुक्तियों की प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका की स्वायत्तता, पारदर्शिता और जवाबदेही से भी जुड़ी है। दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं, जिनमें सरकार, संसद और स्वतंत्र चयन संस्थाओं की भूमिका होती है। भारत की व्यवस्था विशिष्ट है, लेकिन इसका औचित्य तभी बना रह सकता है, जब नियुक्ति प्रक्रिया निष्पक्ष हो और उसमें किसी बाहरी दबाव की गुंजाइश न रहे।
इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की पूर्व प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ के बारे में की गई टिप्पणियां महत्वपूर्ण हैं। न्यायमूर्ति कौल के अनुसार, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ कॉलेजियम के माध्यम से न्यायाधीशों की नियुक्ति के प्रस्ताव भेजने से पहले संबंधित नामों पर सरकार की मंजूरी लेते थे। उन्होंने इसे सरकार के प्रति अत्यधिक सम्मान की भावना से जोड़कर देखा। यदि इन टिप्पणियों का आशय यही है कि नियुक्तियों के मामले में सरकार की सहमति को प्राथमिकता दी जाती थी, तो इससे कॉलेजियम की वास्तविक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठते हैं।
हालांकि, किसी पूर्व न्यायाधीश की टिप्पणी को अपने आप में अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। यह समझना भी जरूरी है कि सरकार से विचार-विमर्श करना और सरकार को नियुक्ति प्रक्रिया में निर्णायक अधिकार देना दो अलग-अलग बातें हैं। यदि किसी नाम पर सरकार की राय जानना केवल प्रशासनिक संवाद का हिस्सा था, तो उसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता का समर्पण नहीं कहा जा सकता। लेकिन यदि सरकार की सहमति के बिना कॉलेजियम अपने निर्णय पर आगे बढ़ने में असमर्थ था, तो यह व्यवस्था की मूल भावना के विपरीत स्थिति होगी। इसलिए इन आरोपों और दावों का निष्पक्ष परीक्षण आवश्यक है।
दरअसल, कॉलेजियम प्रणाली की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी अपारदर्शिता मानी जाती है। न्यायाधीशों के चयन के मानदंड, नामों पर विचार की प्रक्रिया और किसी नाम को स्वीकार या अस्वीकार करने के आधारों के बारे में पर्याप्त जानकारी सार्वजनिक नहीं होती। इससे भाई-भतीजावाद, पक्षपात और बंद कमरे में फैसले किए जाने की आशंकाएं जन्म लेती हैं। दूसरी ओर, यदि नियुक्तियों में कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ता है, तो राजनीतिक विचारधारा के आधार पर चयन या असहमति रखने वाले न्यायाधीशों की उपेक्षा का खतरा भी पैदा हो सकता है। इसीलिए समाधान किसी एक संस्था को असीमित अधिकार देने में नहीं, बल्कि संतुलित, पारदर्शी और जवाबदेह प्रक्रिया विकसित करने में है।
न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों और संविधान की संरक्षक भी है। उसकी विश्वसनीयता पर उठने वाले सवालों का असर पूरी संवैधानिक व्यवस्था पर पड़ता है। ऐसे में वर्तमान न्यायाधीशों और कॉलेजियम को इन चर्चाओं को गंभीरता से लेना चाहिए। नियुक्ति प्रक्रिया के मानदंड स्पष्ट किए जाने चाहिए और निर्णयों के आधारों को यथासंभव सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ सरकार से टकराव नहीं, बल्कि किसी भी अनुचित दबाव से मुक्त होकर निर्णय लेना है। इसी तरह, स्वायत्तता का अर्थ जवाबदेही से छूट भी नहीं हो सकता। कॉलेजियम की साख तभी कायम रह सकती है, जब वह अपनी स्वतंत्रता के साथ पारदर्शिता और निष्पक्षता का भरोसा भी दे। संविधान की गरिमा और लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह आवश्यक है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति न तो सरकार की कृपा पर निर्भर हो और न ही किसी बंद व्यवस्था की मनमर्जी पर।






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