भारतीय चित्रकला में काव्य, प्रेम और विरह की समृद्ध परंपरा पर व्याख्यान

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**लखनऊ, 27 अगस्त।** उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय, लखनऊ द्वारा आयोजित **“पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम-2026”** के अंतर्गत डॉ. विजय माथुर, सलाहकार, संघ लोक सेवा आयोग, नई दिल्ली ने **“भारतीय चित्रकला में काव्य, प्रेम एवं विरह”** विषय पर ज्ञानवर्धक व्याख्यान दिया। उन्होंने भारतीय चित्रकला की विभिन्न परंपराओं के माध्यम से काव्य, प्रेम, मिलन और विरह की भावपूर्ण अभिव्यक्ति पर प्रकाश डाला।
 
डॉ. माथुर ने कहा कि भारतीय चित्रकला केवल रंगों और रेखाओं की कला नहीं, बल्कि भारतीय समाज की साहित्यिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक चेतना का सशक्त दृश्य माध्यम है। भारतीय सौंदर्यशास्त्र में श्रृंगार रस के **संयोग और वियोग**, दोनों पक्षों ने चित्रकला को समृद्ध किया है। कलाकारों ने काव्य में निहित सूक्ष्म भावनाओं को रंग, रेखा और प्रतीकों के माध्यम से सजीव कर चित्रकला को विशिष्ट **दृश्य-काव्य** का स्वरूप प्रदान किया।
 
उन्होंने **अजंता की भित्ति चित्रकला से लेकर मध्यकालीन चित्रकला** तक मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति के विकास पर चर्चा की। साथ ही जयदेव के **‘गीतगोविन्द’**, राधा-कृष्ण प्रेम प्रसंगों तथा राजस्थानी चित्रकला पर **‘रसिकप्रिया’, ‘बिहारी सतसई’ और ‘कविप्रिया’** जैसे काव्यग्रंथों के प्रभाव को रेखांकित किया।
 
व्याख्यान में **बारहमासा चित्रों** में ऋतुओं एवं प्रकृति के माध्यम से व्यक्त विरह की अनुभूति, मुगल चित्रकला में साहित्यिक प्रेमाख्यानों तथा **बसोहली, गुलेर, कांगड़ा और किशनगढ़** शैलियों में प्रेम एवं विरह की कोमल अभिव्यक्ति पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया। उन्होंने कहा कि भारतीय चित्रकला में प्रकृति महज पृष्ठभूमि नहीं रही, बल्कि मानवीय भावनाओं की सक्रिय सहभागी रही है।
 
इस अवसर पर विभाग की निदेशक **श्रीमती रेनू द्विवेदी** ने मुख्य वक्ता डॉ. विजय माथुर को पौधा एवं स्मृति-चिह्न प्रदान कर स्वागत एवं सम्मान किया। उन्होंने कहा कि भारतीय कला, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत के परस्पर संबंधों पर दिया गया यह व्याख्यान प्रतिभागियों के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणास्पद है। ऐसे कार्यक्रम भारतीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत के प्रति प्रतिभागियों की समझ को व्यापक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
 
कार्यक्रम के अंत में निदेशक श्रीमती रेनू द्विवेदी ने मुख्य वक्ता **डॉ. विजय माथुर**, अतिथि **डॉ. नरेंद्र सिंह परमार**, एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, केंद्रीय विश्वविद्यालय हरियाणा सहित सभागार में उपस्थित सभी प्रतिभागियों एवं अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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