सरयूपार क्षेत्र के ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक परिदृश्य पर हुआ व्याख्यान

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**लखनऊ, 27 अगस्त।** उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय, लखनऊ द्वारा आयोजित **“पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम-2026”** के आठवें दिन प्रोफेसर दुर्गेश कुमार श्रीवास्तव ने **“Ancient Settlement Patterns & Geomorphology of Saryupara Region”** विषय पर महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया।
 
प्रो. श्रीवास्तव ने वर्तमान **बलरामपुर, बहराइच, गोण्डा एवं श्रावस्ती** जिलों को सम्मिलित करने वाले सरयूपार क्षेत्र के ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक और भू-आकृतिक परिदृश्य पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि प्राचीन मानव बसावटों के अध्ययन में नदी तंत्र, बाढ़ क्षेत्र, भू-आकृति और भूमि की ऊंचाई की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नदियों एवं सहायक धाराओं से निर्मित भू-परिदृश्य ने विभिन्न कालखंडों में मानव बसावटों को प्रभावित किया।
 
व्याख्यान में **श्रावस्ती, सपुर, चरदा, ओरझार तथा पिरवितानीसरिफ-त्रिलोकपुर** जैसे प्रमुख पुरातात्त्विक स्थलों के उत्खनन एवं सांस्कृतिक अनुक्रम पर चर्चा की गई। इन स्थलों से प्राक्-एनबीपीडब्ल्यू, एनबीपीडब्ल्यू, शुंग, कुषाण, गुप्त तथा मध्यकालीन संस्कृतियों के महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
 
वक्ता ने पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों के दौरान चिन्हित **452 पुरातात्त्विक महत्व के स्थलों** का उल्लेख करते हुए कहा कि विभिन्न सांस्कृतिक कालों में बसावटों के स्थानिक वितरण और उनके बीच की दूरी में आया परिवर्तन क्षेत्र के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास को समझने का महत्वपूर्ण संकेतक है। प्रारंभिक काल में बसावटें अपेक्षाकृत दूर-दूर थीं, जबकि उत्तरवर्ती कालों में इनके अधिक निकट एवं सघन होने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
 
उन्होंने कहा कि प्राचीन कोसल क्षेत्र का महत्वपूर्ण केंद्र रहे **श्रावस्ती** का बौद्ध परंपरा के साथ-साथ प्राचीन व्यापारिक मार्गों की दृष्टि से भी विशेष महत्व था। स्थलाकृतिक, पुरातात्त्विक एवं ऐतिहासिक साक्ष्यों के संयुक्त अध्ययन से गंगा मैदान में मानव बसावटों के विकास और विस्तार को वैज्ञानिक दृष्टि से समझने में सहायता मिलती है।
 
इस अवसर पर विभाग की निदेशक **श्रीमती रेनू द्विवेदी** ने अतिथि वक्ता को पौधा एवं स्मृति-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया। उन्होंने व्याख्यान की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे शैक्षणिक एवं जन-जागरूकता कार्यक्रम प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक एवं पुरातात्त्विक विरासत के प्रति युवाओं और शोधार्थियों में जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
 
कार्यक्रम का मंच संचालन **डॉ. अनोज यादव** ने किया, जबकि ऑनलाइन बैठक का संचालन **श्री बलिहारी सेठ** ने किया। कार्यक्रम में लगभग **100 प्रतिभागियों ने ऑफलाइन तथा 40 प्रतिभागियों ने ऑनलाइन** माध्यम से सहभागिता की।

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