2026 के बाद बदल सकता है संसद का गणित, परिसीमन से बढ़ेंगी लोकसभा सीटें; नया संसद भवन भी भविष्य की संख्या को ध्यान में रखकर तैयार
जनपत की खबर Aug 21, 2026 at 02:45 PM , 12**नई दिल्ली।** देश में लोकसभा की सीटों के राज्यों के बीच पुनर्वितरण और परिसीमन को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 के तहत लोकसभा की सीटों के आवंटन और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्समायोजन का प्रावधान है। 1976 के 42वें संविधान संशोधन के बाद राज्यों के बीच सीटों के पुनर्वितरण पर रोक लगाई गई थी, जिसे 2001 के 84वें संविधान संशोधन ने **2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक** बढ़ा दिया था।
इस व्यवस्था का उद्देश्य उन राज्यों को राजनीतिक रूप से नुकसान से बचाना था, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया। हालांकि, इस अवधि में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्समायोजन किया गया, लेकिन राज्यों के बीच लोकसभा सीटों की कुल संख्या का पुनर्वितरण नहीं किया गया।
### अब आगे क्या होगा?
संवैधानिक व्यवस्था के तहत अगली परिसीमन प्रक्रिया में जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों के पुनर्समायोजन का सवाल महत्वपूर्ण हो जाएगा। हालांकि, परिसीमन कब और किस जनगणना के आधार पर किया जाए, इसे लेकर 2026 में नए विधायी प्रस्ताव भी सामने आए हैं। प्रस्तावित बदलावों में संसद को परिसीमन के समय और इस्तेमाल होने वाली जनगणना के संबंध में कानून के माध्यम से निर्णय लेने की भूमिका देने की बात कही गई है।
इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि **2026 के बाद परिसीमन का संवैधानिक मुद्दा निर्णायक चरण में पहुंच गया है, लेकिन इसकी वास्तविक प्रक्रिया और सीटों की संख्या कानून एवं संवैधानिक प्रावधानों के तहत तय होगी।**
### दक्षिण और उत्तर के राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का सवाल
परिसीमन की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती जनसंख्या और प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन को लेकर है। यदि भविष्य में सीटों का निर्धारण वर्तमान जनसंख्या के अनुपात के आधार पर किया जाता है, तो अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की लोकसभा में हिस्सेदारी बढ़ सकती है, जबकि जनसंख्या नियंत्रण में अपेक्षाकृत सफल रहे दक्षिणी राज्यों की सीट हिस्सेदारी घटने की आशंका जताई जाती रही है।
इसी मुद्दे को लेकर दक्षिणी राज्यों की ओर से चिंता व्यक्त की जाती रही है। हाल में कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या को अगले 25 वर्षों तक बनाए रखने और परिसीमन में 1971 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाने की मांग की है।
### नए संसद भवन में भविष्य की संसद की झलक
परिसीमन की बहस के बीच नए संसद भवन की क्षमता भी चर्चा का विषय बनी हुई है। नए भवन का लोकसभा कक्ष अधिकतम **888 सदस्यों** के बैठने की क्षमता के साथ तैयार किया गया है, जबकि राज्यसभा कक्ष में **384 सदस्यों** के बैठने की क्षमता है। संयुक्त बैठक के लिए लोकसभा कक्ष में कुल **1,272 सदस्यों** के बैठने की व्यवस्था की जा सकती है।
यही वजह है कि नए संसद भवन को भविष्य में संसद की सदस्य संख्या बढ़ने की संभावित जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किए जाने की चर्चा होती रही है। मौजूदा लोकसभा की निर्वाचित सदस्य संख्या 543 है, इसलिए 888 सीटों की क्षमता भविष्य के संभावित विस्तार के लिए पर्याप्त अतिरिक्त स्थान उपलब्ध कराती है।
### 850 तक सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव भी सामने आया
2026 में पेश किए गए परिसीमन संबंधी विधायी प्रस्ताव में लोकसभा की सदस्य संख्या को मौजूदा स्तर से बढ़ाकर **850 तक** करने का प्रस्ताव सामने आया था। प्रस्ताव के अनुसार राज्यों से 815 और केंद्रशासित प्रदेशों से 35 सदस्य होने की व्यवस्था प्रस्तावित की गई थी। हालांकि, यह प्रस्तावित व्यवस्था अंतिम संवैधानिक स्थिति नहीं मानी जा सकती, क्योंकि विधायी प्रक्रिया और संसद द्वारा अंतिम निर्णय महत्वपूर्ण होंगे।
### संसद का गणित बदलने के साथ बदलेगा राजनीतिक प्रतिनिधित्व
परिसीमन केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदलने की प्रक्रिया नहीं होगी, बल्कि इसका सीधा असर संसद में राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है। सीटों के पुनर्वितरण से उत्तर और दक्षिण के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन, केंद्र-राज्य संबंध और राष्ट्रीय राजनीति की दिशा पर व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है।
इसलिए 2026 के बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया को देश के लोकतांत्रिक इतिहास में एक बड़े संवैधानिक और राजनीतिक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। असली सवाल केवल यह नहीं होगा कि लोकसभा में कितनी सीटें बढ़ती हैं, बल्कि यह भी होगा कि **जनसंख्या, संघीय संतुलन और समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच किस तरह का संतुलन बनाया जाता है।**































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