बाराबंकी शिक्षा विभाग में ‘भ्रष्टाचार का खेल’ उजागर: हाईकोर्ट सख्त, DIOS हटाने व STF जांच के आदेश
अन्य खबरे Apr 25, 2026 at 11:35 AM , 19लखनऊ। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने बाराबंकी के शिक्षा विभाग में कथित भ्रष्टाचार के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति राजीव सिंह ने जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) ओ.पी. त्रिपाठी को तत्काल पद से हटाने के निर्देश दिए हैं, साथ ही पूरे प्रकरण की जांच स्पेशल टास्क फोर्स (STF) से कराने का आदेश दिया है।
यह मामला सिटी इंटरमीडिएट कॉलेज, बाराबंकी से जुड़ा है, जहां सहायक अध्यापक (संस्कृत) अभय कुमार पर गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। आरोप है कि उन्होंने प्रबंध समिति को बिना सूचना दिए छत्तीसगढ़ के बीजापुर स्थित एकलव्य विद्यालय में प्रवक्ता पद पर कार्यभार ग्रहण किया और वहां से विधिवत कार्यमुक्त हुए बिना ही बाराबंकी लौटकर दोबारा ज्वाइनिंग कर ली। इस प्रक्रिया में DIOS कार्यालय और कॉलेज प्रशासन की मिलीभगत सामने आई है।
याचिकाकर्ता सरदार आलोक सिंह की ओर से अधिवक्ता आकाश दीक्षित ने अदालत को बताया कि संबंधित शिक्षक को अक्टूबर 2025 का वेतन बाराबंकी से जारी कर दिया गया, जबकि वह उस समय छत्तीसगढ़ में कार्यरत थे। इस पर न्यायालय ने तीखी टिप्पणी करते हुए इसे “गंभीर प्रशासनिक अपराध” करार दिया और रिकॉर्ड में हेरफेर व जालसाजी की आशंका जताई।
अदालत के प्रमुख निर्देश:
अदालत ने माध्यमिक शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को निर्देशित किया है कि DIOS ओ.पी. त्रिपाठी का तत्काल तबादला किया जाए। साथ ही STF महानिदेशक को जांच की जिम्मेदारी सौंपते हुए कहा गया है कि कम से कम डीएसपी रैंक का अधिकारी इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करेगा।
जांच के दायरे में DIOS, प्रधानाचार्य डॉ. शिव चरण गौतम और शिक्षक अभय कुमार की भूमिका शामिल होगी। अदालत ने अभय कुमार की पुनर्नियुक्ति को अवैध घोषित करते हुए उनके द्वारा लिए गए वेतन की वसूली संबंधित अधिकारियों से करने का आदेश दिया है। इसके अतिरिक्त संयुक्त शिक्षा निदेशक, अयोध्या मंडल के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि STF जांच में भ्रष्टाचार या जालसाजी के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर आपराधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही झूठा हलफनामा दाखिल करने के मामले में भी अदालत ने कड़ी नाराजगी जताई।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति राजीव सिंह ने कहा, “प्रशासनिक पारदर्शिता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। इस तरह की कार्यप्रणाली शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करती है।”
इस फैसले के बाद बाराबंकी से लेकर लखनऊ तक शिक्षा विभाग में हलचल मच गई है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि आदेशों के अनुपालन में देरी रोकने के लिए डिजिटल माध्यमों का उपयोग बढ़ाया जाएगा, ताकि फाइलों के स्तर पर लापरवाही या दबाव की गुंजाइश समाप्त हो सके।



























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