*जब्ती करों से लोक-केंद्रित सुधार तक: 2025 में भारत की कर संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव*
लखनऊ Jan 01, 2026 at 05:50 PM , 152लखनऊ।
1930 में, महात्मा गांधी द्वारा नमक कर की अवज्ञा ने उजागर किया था कि कैसे दमनकारी कर प्रणाली नागरिक को राज्य से दूर कर सकती है। यह एक चेतावनी थी कि जब कर मनमाने या अत्यधिक होते हैं, तो वे विश्वास और सामाजिक सम्पर्क को कमजोर करते हैं। चार दशक बाद, भारत में एक और चरम स्थिति देखी गई, जब पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आयकर के स्तर को आश्चर्यजनक रूप से 97.5 प्रतिशत तक बढ़ा दिया।
इस परम्परा ने करदाताओं और राज्य के बीच गहरा अविश्वास पैदा कर दिया। दशकों तक, भय के कारण अनुपालन होता रहा। इसने सक्रिय योगदान देने के बजाय टालमटोल को प्रोत्साहित किया। इसी पृष्ठभूमि में मोदी सरकार के कर सुधार, जो 8 वर्ष पहले आरंभ हुए और 2025 में निर्णायक रूप से आगे बढ़े, अतीत से एक स्पष्ट अंतर का प्रतीक हैं।
इस बदलाव में अंतर्निहित लाफ़र कर्व का तर्क यह है कि कम कर दरें राजस्व सृजन के लिए उप-इष्टतम हैं और कर आधार का विस्तार करती हैं। इस प्रकार भारत के 2025 के कर सुधार न केवल राजकोषीय परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करते हैं, बल्कि एक दार्शनिक परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो उत्पीड़न से सहयोग तक और अविश्वास से लेकर राज्य और नागरिक के बीच एक नया सामाजिक अनुबंध है।
जीएसटी से पहले की वास्तविकता: विखंडन, रिसाव और अविश्वास
वैट शासन के दौरान, अप्रत्यक्ष करों की बहुलता ने व्यापक स्तर पर भ्रम पैदा किया , राज्यों ने 0 प्रतिशत, 4 प्रतिशत और 12.5 प्रतिशत के एकसमान स्लैब को खत्म करते हुए बार-बार वैट दरों में बदलाव किया।
वास्तव में, स्पष्ट चेतावनियों के बावजूद, राज्यों ने अतिरिक्त शुल्क लगाने के विरूद्ध अपनी 2010 की रिपोर्ट में कैग की सुस्पष्ट सलाह की अनदेखी कर दी, फिर भी प्रवेश कर और स्थानीय अधिभार जारी रहे। इसने भ्रम और विखंडन पैदा किया और प्रत्येक राज्य ने अपने स्वयं के अनुपालन नियमों, दंड और प्रक्रियाओं को लागू किया।
इसके गंभीर परिणाम हुए। कमजोर जांच और असंगत प्रवर्तन ने कर चोरी को प्रोत्साहित किया। हर दो डीलरों में से एक ने कर चोरी करने का प्रयास किया और सिर्फ एक मामले में ही, सात डीलरों को उचित दस्तावेज के बिना 1,026 करोड़ रुपये की छूट दे दी गई।
अगली पीढ़ी के जीएसटी सुधार (2025): कार्यनीति के रूप में सरलता
वर्ष 2017 में जीएसटी की शुरुआत ऐतिहासिक थी। इसने भारत को एकल बाजार में समेकित किया, व्यापक करों को समाप्त कर दिया और एक पारदर्शी अप्रत्यक्ष कर प्रणाली की नींव रखी। यद्पि, दरों और वर्गीकरण में अस्पष्टता के कारण विवाद पैदा हुए और निस्संदेह अनुपालन के साथ-साथ पंजीकरण में भी भारी समस्याएं रहीं।
उदाहरण के लिए, वस्त्र क्षेत्र में धुलाई और रंगाई जैसी सेवाओं पर "जॉब वर्क सर्विसेज" के हिस्से के रूप में 5 प्रतिशत कर लगाया गया था, जबकि ब्लीचिंग, प्रिंटिंग और रासायनिक उपचार जैसी प्रक्रियाओं पर 18 प्रतिशत का कर लगाया गया था। इससे वर्गीकरण को लेकर गंभीर भ्रम और कर विवाद पैदा हो गए।
इन चुनौतियों को स्वीकार करते हुए मोदी सरकार ने 2025 में अगली पीढ़ी के जीएसटी सुधारों की शुरुआत की, जो जीएसटी के लॉन्च के बाद से सबसे सार्थक सरलीकरण प्रदान करते हैं। इस प्रणाली को दो स्पष्ट स्लैब, 5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत में युक्तिसंगत बनाया गया था। साथ ही, वस्तुओं के वर्गीकरण को भी स्पष्ट किया गया, अनुपालन को सरल बनाया गया और पंजीकरण को सुगम बनाया गया।
पिछले 8 वर्षों में सरकार ने सक्रिय रूप से व्यवसायों और राज्यों की बात सुनी है और राज्यों को कार्यान्वयन में समान भागीदार माना है। इस सहयोगात्मक दृष्टिकोण ने सुनिश्चित किया कि सुधारों को सुचारू रूप से लागू किया जाए।
2025 के जीएसटी सुधारों ने करों को सरल बनाने से कहीं अधिक काम किया; उन्होंने कई सेक्टरों में मांग को सीधे तौर पर प्रेरित किया।
भारत में दीपावली के अवसर पर 6.05 ट्रिलियन रूपये की सबसे अधिक बिक्री दर्ज की गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में 25 प्रतिशत से अधिक है। एक दशक से अधिक समय में यह इसकी सबसे मजबूत नवरात्रि बिक्री रही है। साथ ही, अक्टूबर 2025 में ऑटोमोबाइल खुदरा बिक्री 40.5 प्रतिशत बढ़कर सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गई।
जिन आलोचकों ने यह तर्क दिया था कि जीएसटी को सरल बनाने और दरों को तर्कसंगत बनाने से कर राजस्व में कमी आएगी, वे भी गलत साबित हुए। अक्टूबर-नवंबर 2025 में, जीएसटी में महत्वपूर्ण कटौती के बावजूद, सकल जीएसटी संग्रह 2024 में इसी अवधि की तुलना में 2.8 प्रतिशत अधिक था।
जीएसटी दरों में कटौती और आयकर छूट की सीमा में वृद्धि से परिवारों को सालाना 2.5 लाख करोड़ रुपये की बचत करने में मदद मिलेगी। सभी व्यक्तिगत जीवन और स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम पर 0 प्रतिशत जीएसटी लगेगा, जो 18 प्रतिशत से कम है। इसका अर्थ है कि 20,000 रुपये के बेस प्रीमियम पर पहले 3,600 रुपये जीएसटी (18 प्रतिशत) था, जिससे 23,600 रुपये देय था। छूट के बाद, 20,000 रुपये के भुगतान पर सीधे 3,600 रुपये की बचत है।
जीएसटी में सुधार से किराने का सामान और दैनिक आवश्यक वस्तुओं के घरेलू बिलों में 13 प्रतिशत की बचत होगी, जबकि एक छोटी कार का खरीदार लगभग 70,000 रुपये बचा सकता है। एसी खरीद में 2,800 रुपये की बचत होगी क्योंकि इन वस्तुओं की जीएसटी दर 28 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दी गई है।
जीएसटी स्लैब को तर्कसंगत बनाकर और आवश्यक एवं आकांक्षी दोनों वस्तुओं पर कर के बोझ को कम करके, सरकार ने आत्मविश्वास से व्यय करने और निरंतर मांग का वातावरण सृजित किया।
मध्यम वर्ग के लिए कर में महत्वपूर्ण लाभ
भारत की आयकर यात्रा इसके आर्थिक विकास को दर्शाती है। इंदिरा गांधी के युग में कर की दर 97.5 प्रतिशत तक पहुंच गई थी और कर चोरी और अविश्वास की जड़ें गहरी हो चुकी थीं। दशकों बाद, उदारीकरण के बावजूद, 2014 में राहत मामूली रही; आयकर छूट को 2 लाख रुपये तक सीमित कर दिया गया था, जो शहरीकरण की अर्थव्यवस्था के लिए पर्याप्त नहीं था।
मोदी सरकार ने मध्यम वर्ग पर कर के बोझ को निरंतर कम किया है, प्रासंगिक उपायों पर नीतिगत स्थिरता को प्राथमिकता दी है। पिछले दशक में आयकर छूट की सीमा 2014 में 2 लाख रुपये से बढ़कर 2025 में 12 लाख रुपये हो गई है, जो 6 गुना राहत प्रदान करती है।
वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए, 75,000 रुपये की मानक कटौती के बाद, प्रभावी शून्य-कर सीमा अब 12.75 लाख रुपये प्रति वर्ष है।
नई व्यवस्था में 12 लाख रुपये की आय वाले करदाताओं को 80,000 रुपये का कर लाभ मिलेगा जबकि 18 लाख रुपये की आय वाले व्यक्ति को टैक्स के रूप में 70,000 रुपये का लाभ मिलेगा।
नमक कर से लेकर आयकर की जब्ती दरों तक, भारत का इतिहास बताता है कि त्रुटिपूर्ण कर प्रणाली विश्वास और विकास को कमजोर करती है। मोदी सरकार के 2025 के कर सुधार उस अतीत से एक स्पष्ट अंतर का प्रतीक है। सरलता, निष्पक्षता और पारदर्शिता को प्राथमिकता देकर, राज्य ने उपभोग में वृद्धि करते हुए अनुपालन को सुदृढ़ किया है।
2025 में, भारत में कर प्रणाली अब नियंत्रण का माध्यम नहीं रह गई है। यह एक साझेदारी है, जो यह मानती है कि जब नागरिकों पर भरोसा किया जाता है और प्रणालियां सरल होती हैं, तो अर्थव्यवस्था विकास के साथ मिलकर कदम बढ़ाती है।
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