*दीपावली को यूनेस्को से वैश्विक मान्यता, दीपावली यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल*

लखनऊ , 108

लखनऊ।
रोशनी और खुशियों का पर्व दीपावली अब पूरी दुनिया के सामने भारत की जीवंत सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक के रूप में मान्यता पा चुका है। यूनेस्को ने दीपावली को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल कर भारत की इस प्राचीन परंपरा को वैश्विक सम्मान दिया है। नई दिल्ली के लाल किले में 8 से 13 दिसंबर 2025 के बीच आयोजित यूनेस्को की 20वीं अंतर-सरकारी समिति की बैठक में 194 सदस्य देशों के प्रतिनिधियों और विशेषज्ञों की मौजूदगी में यह निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया। दीपावली भारत की ओर से इस सूची में दर्ज 16वां तत्व बन गई है, जिसे सांस्कृतिक गौरव के महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जा रहा है।

दीपावली को केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जीवंत और सर्वसमावेशी सांस्कृतिक परंपरा माना गया है, जो समाज में सद्भाव, सामुदायिक भागीदारी और समग्र विकास की भावना को मजबूती देती है। हर साल कार्तिक अमावस्या की रात जब गांवों, कस्बों और शहरों में लाखों दीये जलते हैं, तो यह उत्सव अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की जीत का सांस्कृतिक प्रतीक बनकर लोगों को जोड़ता है। यह पर्व खुशी, नई शुरुआत, आपसी जुड़ाव और साथ मिलकर आगे बढ़ने के भाव को मजबूती देता है, जिसमें किसी भी रूप में सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक एकता के सिद्धांतों से समझौता नहीं होता।

दीपावली के साथ जुड़ी विभिन्न कथाएं—भगवान राम की अयोध्या वापसी, भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर पर विजय, देवी लक्ष्मी की पूजा, भगवान महावीर के निर्वाण दिवस की स्मृति, देव दीपावली, काली पूजा, गोवर्धन पूजा और भाईदूज—इस पर्व को विविध स्वरूप देती हैं, लेकिन सभी के केंद्र में उम्मीद, न्याय, करुणा और मानवीय मूल्यों की विजय का भाव ही है। पांच दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में धनतेरस पर शुभ खरीदारी, नरक चतुर्दशी पर नकारात्मकता को दूर करने की प्रतीकात्मक परंपराएं, मुख्य दीपावली की रात लक्ष्मी-गणेश पूजन, गोवर्धन/अन्नकूट के माध्यम से प्रकृति और अन्न के प्रति आभार, तथा भाईदूज पर भाई-बहन के स्नेह का उत्सव शामिल है।

यह पर्व केवल सांस्कृतिक नहीं, आर्थिक दृष्टि से भी करोड़ों लोगों के जीवन से सीधा जुड़ा है। कुम्हारों, दीये और मिट्टी के सजावटी सामान बनाने वाले कारीगरों, मिठाई और नमकीन तैयार करने वालों, कपड़ा, आभूषण और साज-सज्जा कारोबारियों, फूलवालों और छोटे दुकानदारों के लिए दीपावली का मौसम आजीविका और अतिरिक्त आमदनी का सबसे बड़ा अवसर बनकर आता है। ग्रामीण क्षेत्रों में खेती से जुड़े चक्र, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामुदायिक मेल-मिलाप की परंपराएं इस पर्व के सामाजिक और आर्थिक महत्व को और मजबूत करती हैं।

हाल के वर्षों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता ने दीपावली के स्वरूप को भी सकारात्मक दिशा दी है। स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल उत्सव पर जोर, ग्रीन क्रैकर्स जैसी पहल, और सफाई अभियानों से जुड़ी परंपराएं त्योहार को आधुनिक संवेदनशीलताओं के करीब लेकर आई हैं। घरों, गलियों और सार्वजनिक स्थानों की सफाई, स्वस्थ जीवनशैली और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को बढ़ाती है, जबकि परिवार और समुदाय का एक साथ आना मानसिक और सामाजिक भलाई को भी सहारा देता है।

दीपावली से जुड़ा यह सांस्कृतिक ताना-बाना आजीविका, लैंगिक समानता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सामुदायिक सहभागिता, पारंपरिक हुनर और लोक-कला के संरक्षण जैसे कई सतत विकास लक्ष्यों को भी स्पर्श करता है। विविध समुदायों, विद्वानों, कलाकारों, किसानों, आदिवासी समूहों, प्रवासी भारतीयों और हाशिये पर रहने वाले वर्गों की भागीदारी के साथ तैयार किए गए नामांकन ने यह संदेश भी दिया है कि यह पर्व केवल एक समुदाय या क्षेत्र का नहीं, बल्कि साझा मानव मूल्यों, आशा और सौहार्द की विरासत है।

***

Related Articles

Comments

Back to Top