गुड़ शक्कर उद्योग विस्थापित हुआ चीनी उद्योग से रकम मिलते ही मानक युक्त बन जाता है कोल्हू

लखीमपुर खीरी , 260

(मनोज मिश्र)

धौरहरा/लखीमपुर खीरी। एक समय था जब यह जनपद प्राकृतिक रूप से मिठास देने के लिए प्रसिद्ध था कालांतर में बल्कि अभी भी इसे चीनी का कटोरा कहा जाता है परंतु फर्क यह हो गया है कि प्राकृतिक रूप से चलने वाले कोल्हू जिनके द्वारा  गुड़ उद्योग तक चल रहा था धीरे-धीरे नदारद होते चले गए और उनकी जगह विशुद्धतः मशीनों ने ले ली और जनपद में खांडसारी उद्योग भी चल रहा था और सैकड़ों क्रेशर इस जनपद में हुआ करते थे जिनके नियंत्रण हेतु सरकार का एक कार्यालय बना हुआ था धीरे-धीरे समय बदलता गया और जनपद में खांडसारी उद्योग के बजाय चीनी उद्योग ने पांव पसार दिए जिससे जिले में प्राकृतिक रूप से बनने वाली गुड़ शक्कर का कार्य लगभग समाप्त होने की ओर अग्रसर है एवं चीनी उद्योग पूरी तरह हाबी हो चुका है। हालांकि ऐसा नहीं है कि जनपद में अभी गुड़ आदि का उत्पादन नहीं होता बस तरीका थोड़ा आधुनिक होता जा रहा है। 
  जनपद के धौरहरा क्षेत्र को ही अगर ले ले जिसके अंतर्गत एक छोटे से लहबड़ी इलाके में ही  गुड़ बनाने वाले दर्जनों कोल्हू चल रहे हैं। बताते हैं कि इनकी संख्या पहले काफी हुआ करती थी परंतु उद्योग को प्रशासनिक रूप से बढ़ावा कम देने और वसूली ज्यादा करने के कारण तमाम लोग कोल्हू चलाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।
 सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार क्षेत्र के कोल्हू संचालकों से खाद्य विभाग लाइसेंस के नाम पर मनमानी फीस लेता है तो वही जिला पंचायत अपनी खानापूर्ति के लिए हजारों की वसूली प्रति कोल्हू के हिसाब से करता है साथ ही पुलिस अग्निशमन विभाग भी सिलेंडर देकर मनमानी तरीके से हजारों वसूलता है पैसे लेकर मानक विहीन कोल्हू भी मानक युक्त बन जाता है और उसकी चिमनियां कार्बन डाइऑक्साइड की जगह ऑक्सीजन छोड़ने लगती हैं।

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