“ कण-कण में नहीं रहते भगवान, परमधाम का वासी है परमात्मा _महात्मा रामाधार जी

लखीमपुर खीरी , 499

महाकुंभ प्रयागराज/लखीमपुर।
सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस द्वारा संस्थापित संस्था सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्त्वावधान में महाकुंभ मेला हरिश्चंद्र चौराहा स्थित शिविर में सत्संग सुनाते हुए महात्मा रामाधार दास ने कहा, आज वर्तमान के धर्म उपदेशक लोग परमात्मा परमेश्वर या भगवान को कण-कण में बताकर घोर अज्ञानता का परिचय दे रहे हैं । प्रहलाद जैसे भगवद् समर्पित-शरणागत भक्त के रक्षा-मर्यादा के लिये यदि भगवान खम्भे से निकल कर प्रकट हुये तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं हुआ कि भगवान खम्भे-खम्भे में बैठे रहते हैं या उस खम्भे में पहले से बैठे हुये थे । इसका अर्थ यह हुआ कि भगवान अपने समर्पित-शरणागत भक्त के रक्षा-मर्यादा के लिये परिस्थिति और वातावरण के अनुकूल ही कहीं भी प्रकट होकर उसकी रक्षा-व्यवस्था करते रहते हैं । जैसे द्रोपदी के मर्यादा-रक्षा हेतु, गज के प्राण-रक्षा हेतु और अजामिल को यमदूतों से बचाने हेतु भगवान स्वयं चलकर ही आये थे । सोने-चाँदी लोहे-लकड़ी में तो जीव भी नहीं रहता, भगवान या परमात्मा के होने-रहने की बात तो मात्र कल्पना और अटकल है , कण-कण में भगवान की शक्ति मात्र है, जो भगवान से उत्पन्न और भगवान से पृथक् हुई है, जिसको परमाणु बम के फटने पर सुना-देखा जाता है। इस प्रकार कण-कण में भगवान के रहने वाली बात कहकर लोग वास्तव में समाज को अपने घोर अज्ञानता का परिचय देते हुये भरमाते हैं।
उनका कहना है कि परमात्मा एक ‘सर्वोच्च-सर्वश्रेष्ठ-सर्वोत्तम परमशक्ति-सत्ता हैं । जो अपने परम आकाश रूप परमधाम में रहता है । उस परमात्मा के समकक्ष कोई भी या कुछ भी नहीं है। सब के सब और सब कुछ भगवान के अधीन और अन्तर्गत ही है । सब की और सब कुछ की उत्पत्ति उसी से और सबकी स्थिति उसी में है। ऐसे उस परमात्मा को सभी के हृदय में वास करने वाला बताना ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार बल्ब में पावर-हाउस का होना या लोटे में समुद्र का होना बताया जाना। भगवान है ही एक, इसलिये एक ही शरीर से क्रियाशील होता है, वह भी मात्र अवतार बेला में। जैसे पूरे सत्ययुग में श्रीविष्णु जी महाराज, त्रेतायुग में ­ श्रीराम जी महाराज और पूरे द्वापरयुग में श्रीकृष्ण जी महाराज ही भगवान के अवतार थे ।  महात्मा जी ने गीता का 9 अध्याय श्लोक 4 बताते हुए कहा 
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
 मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेषवस्थितः॥ 
अर्थात मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत्‌ जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं, किंतु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।

Related Articles

Comments

Back to Top