“सोहँ परमात्मा तो है ही नहीं , विशुद्धतः आत्मा भी नहीं , ये घोर पतनोन्मुखी सहज स्थिति है” - महात्मा रामाधार
लखीमपुर खीरी Jan 17, 2025 at 03:30 PM , 704महाकुंभ मेला प्रयागराज/लखीमपुर।
सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस द्वारा संस्थापित संस्था सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्त्वावधान में महाकुंभ मेला हरिश्चंद्र चौराहा स्थित शिविर में सत्संग सुनाते हुए महात्मा रामाधार दास ने कहा- जप-तप-ब्रत-नियम-ध्यान-साधना-पूजा-आराधना-भक्ति-सेवा इसलिए किया जाता है कि जिससे हमारे जीवन का लक्ष्य परमप्रभु परमात्मा की प्राप्ति हो जाए ताकि हमारा जीवन मुक्ति-अमरता से युक्त भगवद्मय हो जाए । जिस साधना से , जिस गुरु से हमारे कल्याण के बजाए पतन-विनाश हो जाए ऐसे साधना और ऐसे गुरु को सर्वथा छोड़ देना चाहिए ।
उन्होंने कहा आजकल ऐसे बहुत गुरुजी लोग मिलते हैं जो अपने शिष्यों को सोहँ साधना कराते हैं । वे सोहँ को ही परमात्मा मानते हैं जबकि हमारे सद्गुरु सन्त ज्ञानेश्वर जी का स्पष्ट कहना है कि ऐसा करके वे गुरुजी लोग अपने शिष्यों के दुर्लभ व अनमोल मानव जीवन को पतन विनाश में धकेल रहे हैं ।
महात्मा जी ने कहा कि सोहँ परमात्मा तो है ही नहीं विशुद्धतः आत्मा भी नहीं । सोहँ घोर पतन के तरफ ले जाने वाली श्वांस और निश्वास के माध्यम से सहज भाव से होते रहने वाली सहज स्थिति है । सोहँ तो योग की क्रिया भी नहीं है इसे ही तत्त्वज्ञान कह देना तो घोर अज्ञानता की बात है । तत्त्वज्ञान तो वह है जिसमे जीव एवम आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म और परमात्मा -परमेश्वर-परमब्रह्म तीनो का अलग अलग जानकारी, साक्षात दर्शन और बात-चीत सहित उनके विराटरूप का भी वास्तविक दर्शन प्राप्त होता है।































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