“ कोई भी गुरु भगवान् नहीं, भगवान् सर्वोच्च सत्ता-शक्ति”

लखीमपुर खीरी , 550

महाकुंभ प्रयागराज/लखीमपुर।
सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस द्वारा संस्थापित संस्था सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्त्वावधान में महाकुंभ मेला हरिश्चंद्र चौराहा स्थित शिविर में सत्संग सुनाते हुए महात्मा मोहन दास ने कहा, “गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागूं पाय । बलिहारी गुरु आपने, जो गोविन्द दियो लखाय” ।। इस श्लोक का अर्थ समझाते हुए उन्होंने कहा कि वह गुरु जो गोविन्द को लखा दे अर्थात् भगवान् को साक्षात् बातचीत सहित मुक्ति-अमरता का बोध कराते हुए गीतावाला ही विराटपुरुष का दर्शन करा दे, वह ही गुरु भगवान् होता है जैसे भगवान् श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को कराया था । 
उन्होंने आगे श्लोक सुनाते हुए कहा-
“गुर्रु ब्रम्हा गुर्रु विष्णु गुर्रुदेव महेश्वरः । गुर्रु साक्षात् परमब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नमः।।“ 
यह स्तुतिगान ब्रम्हाजी द्वारा उस समय किया गया जब विष्णुजी द्वारा हरिद्वार में हरि की पैड़ी में ब्रम्हा जी को तत्त्वज्ञान की प्राप्ति हुई, जिसमें उन्होंने विष्णु जी में ही ब्रम्हा-विष्णु-महेश और सृष्टि, ब्रम्हाण्ड आदि सबकुछ उन्हीं में और उन्हीं से निकलते व प्रवेश करते हुए विराट रुप सहित ज्ञान-दृष्टि से देखा । उन्होंने साक्षात् परमब्रम्ह-परमात्माको देख-जानकर यह स्तुति-गान किया । अब इसका अर्थ कोई यह लगाए कि सभी गुरु ही ब्रम्हा-विष्णु-महेश और साक्षात् परमब्रम्ह-परमात्मा है तो यह बात बिल्कुल ही झूठ-गलत और हास्यास्पद है । क्योंकि भगवान् पूरे भू-मण्डल पर युग युग में एकमेव एक ही होता है जैसे सत्युग में एकमेव एक श्री विष्णु जी, त्रेता युगमें एकमेव एक श्रीराम जी एवं पूरे द्वापर युग में पूरे भू-मण्डल पर एकमेव एक श्री कृष्ण जी और वर्तमान कलियुग में पूरे भू-मण्डल पर वही तत्त्वज्ञान-भगवद्ज्ञान ‘सदानन्द’ वाली शरीर से अवतरित होकर कार्य किया। उसी ज्ञान को जान-देख-पहचान कर सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस के शिष्य एवं अनुयायी गण धर्म-धर्मात्मा-धरती रक्षार्थ धर्म के नाम पर फैले आड़म्बर-ढोंग-पाखण्ड को समूल समाप्त करने के लिए तन-मन-धन से समर्पित एवं कृत संकल्पित हैं।

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