नाला पाटे जाने से जलमग्न हुई 80–90 एकड़ फसल, किसानों के सामने रोजी-रोटी का संकट

लखीमपुर खीरी , 0

जलनिकासी बंद होने से नरैहिया तालाब के आसपास खेतों में भरा पानी, महीनों की मेहनत बर्बाद होने की आशंका

लखीमपुर खीरी। फूलबेहड़ ब्लॉक क्षेत्र की ग्राम पंचायत गंगाबेहड़ में नरैहिया तालाब के आसपास भारी बारिश के बाद करीब 80–90 एकड़ कृषि भूमि जलभराव की चपेट में बताई जा रही है। खेतों में पानी भरने से खड़ी फसलों पर संकट मंडरा रहा है। किसान अपनी महीनों की मेहनत और खेती में लगी लागत को डूबते हुए देखने को मजबूर हैं।

किसानों के लिए यह महज खेतों में पानी भरने का मामला नहीं है, बल्कि उनकी सालभर की कमाई और परिवार की आजीविका पर मंडराता संकट है। किसानों का कहना है कि बड़ी मेहनत और खर्च के बाद तैयार की गई फसल यदि पानी में खराब हो गई तो उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

नाला था जलनिकासी का सहारा, अब पानी निकले तो निकले कैसे?

ग्रामीणों के अनुसार, नरैहिया तालाब और आसपास के खेतों से बारिश का पानी बाहर निकालने के लिए पहले एक नाला मौजूद था। बारिश के दौरान इसी रास्ते पानी की निकासी होती थी। ग्रामीणों का आरोप है कि पूर्व में नाले को पाट दिए जाने के बाद जलनिकासी का रास्ता प्रभावित हुआ, जिसके चलते बारिश का पानी खेतों में जमा हो रहा है।

किसानों का कहना है कि यदि जलनिकासी का रास्ता पहले की तरह मौजूद रहता और समय रहते नाले की सफाई कराई जाती तो पानी की निकासी बेहतर तरीके से हो सकती थी। हालांकि, नाला किसके द्वारा और किन परिस्थितियों में पाटा गया, इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।

फसल डूबने का डर, किसान परेशान

खेतों में लगातार पानी जमा रहने से किसानों की चिंता बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि यदि जल्द जलनिकासी नहीं हुई तो खड़ी फसल को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। खेती पर निर्भर परिवारों के लिए यह नुकसान सीधे उनकी घरेलू अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा।

ग्रामीणों के बीच फिलहाल यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। किसानों ने अभी तक प्रशासन को कोई लिखित शिकायत या मांगपत्र नहीं दिया है, लेकिन उनका कहना है कि यदि शिकायत की जाती है तो केवल मौके पर जलभराव देखकर लौटने के बजाय समस्या की मूल वजह की जांच भी की जानी चाहिए।

किसानों की मांग—सिर्फ पानी निकालना नहीं, स्थायी समाधान चाहिए

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन यदि मौके पर जांच कराता है तो जलभराव की वास्तविक स्थिति के साथ-साथ पुराने जलनिकासी मार्ग की भी पड़ताल की जाए। यदि जांच में नाला बंद या पाटा हुआ पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई करते हुए जलनिकासी का रास्ता बहाल कराया जाए।

किसानों का कहना है कि आज पानी निकाल भी दिया जाए, लेकिन जलनिकासी की स्थायी व्यवस्था नहीं हुई तो अगली भारी बारिश में यही समस्या फिर खड़ी हो सकती है। इसलिए जरूरत तत्काल राहत के साथ-साथ स्थायी जलनिकासी व्यवस्था सुनिश्चित करने की है।

अब देखना यह है कि किसानों की इस चिंता पर प्रशासन कब संज्ञान लेता है और क्या मौके पर जांच कराकर जलभराव के वास्तविक कारण का पता लगाया जाता है।

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