कर्तव्य पथ पर राजस्थान की झांकी बनी आकर्षण का केन्द्र, बीकानेर की उस्ता कला ने बिखेरा ‘मरुस्थल का स्वर्ण स्पर्श’

राजस्थान , 91

नई दिल्ली। गणतंत्र दिवस समारोह के अवसर पर कर्तव्य पथ पर “राजस्थान : मरुस्थल का स्वर्ण स्पर्श” विषय पर निकलने वाली राजस्थान की झांकी गुरुवार सायं दिल्ली केंट स्थित आर.आर. कैम्प रंगशाला में आयोजित प्रेस प्रिव्यू में सभी के आकर्षण का केन्द्र बनी। बीकानेर की विश्वविख्यात उस्ता कला को केंद्र में रखकर तैयार की गई इस झांकी ने अपनी विशिष्ट शिल्पकला और सांस्कृतिक वैभव से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
झांकी के अग्रभाग में राजस्थान के प्रसिद्ध लोक वाद्य रावणहट्टा का वादन करते कलाकार की प्रतिमा प्रदर्शित की गई है, जो 180 डिग्री घूमती हुई दिखाई देती है। इसके दोनों ओर उस्ता कला से अलंकृत सुराही, कुप्पी और दीपक आकर्षक फ्रेमों में लगाए गए हैं। झांकी का यह अग्रभाग लगभग 13 फीट ऊँचा है।
झांकी के ट्रेलर भाग में घूमती हुई पारंपरिक कुप्पी को उस्ता कला से सुसज्जित कर प्रदर्शित किया गया है। इसके साथ ही पारंपरिक हस्तशिल्प पर कार्य करते कारीगरों के दृश्य दर्शाए गए हैं, जो इस कला की जीवंत परंपरा को सजीव रूप में प्रस्तुत करते हैं। पृष्ठभाग में विशाल ऊँट और ऊँटसवार की प्रतिमा राजस्थान की मरुस्थलीय संस्कृति और लोकजीवन का सशक्त प्रतीक बनी हुई है।
झांकी के दोनों ओर उस्ता कला से सजे मेहराबों में विभिन्न सामग्रियों पर की गई पत्तेदार स्वर्ण कारीगरी के सुंदर उदाहरण प्रदर्शित किए गए हैं। इसके चारों ओर गेर लोक नृत्य प्रस्तुत करते कलाकारों ने राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान को और अधिक प्रभावशाली बनाया। कुल मिलाकर यह झांकी पारंपरिक कला, लोक संस्कृति और शाही विरासत का भव्य संगम बनकर उभरी है।
झांकी के डिजाइनर एवं पर्यवेक्षक हरशिव कुमार शर्मा ने बताया कि 23 जनवरी को फुल ड्रेस रिहर्सल तथा 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मुख्य समारोह में कर्तव्य पथ पर निकलने वाली केन्द्र एवं राज्यों की झांकियों में राजस्थान की यह झांकी बीकानेर की उस्ता कला का भव्य प्रदर्शन करेगी।
राजस्थान ललित कला अकादमी के सचिव डॉ. रजनीश हर्ष ने बताया कि इस झांकी का निर्माण राज्य की उप मुख्यमंत्री एवं पर्यटन, कला एवं संस्कृति मंत्री दिया कुमारी, अतिरिक्त मुख्य सचिव प्रवीण गुप्ता तथा उप सचिव अनुराधा गोगिया के मार्गदर्शन में किया गया है।
उल्लेखनीय है कि उस्ता कला ऊँट की खाल पर की जाने वाली स्वर्ण जड़ाई की पारंपरिक शाही कला है, जिसकी उत्पत्ति ईरान में मानी जाती है। मुगल काल में विकसित होकर यह कला बीकानेर के महाराजा राय सिंह के शासनकाल में राजस्थान पहुँची, जहाँ स्थानीय कारीगरों ने इसे विशिष्ट पहचान दिलाई। इस कला में 24 कैरेट स्वर्ण पत्र और प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता है, जिससे इसकी चमक लंबे समय तक बनी रहती है। वर्तमान में यह कला ऊँट की खाल के साथ-साथ लकड़ी, संगमरमर, कांच और दीवारों तक विस्तार पा चुकी है। बीकानेर की उस्ता कला को भौगोलिक संकेतक (जीआई टैग) भी प्राप्त है, जो इसकी मौलिकता और सांस्कृतिक महत्व को प्रमाणित करता है।

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