अदभुत मंदिर:भगवान् शिव का वृहदेश्वर मंदिर

परिवेश , 1209

तमिलनाडु के तंजावुर में स्थित बृहदेश्वर मंदिर अपने आप में एक अद्भुत और रहस्यमयी संरचना है .चोल साम्राज्य के ‘द ग्रेट लिविंग टेंपल्स’ में से एक भगवान शिव को समर्पित वृहदेश्वर मंदिर को महान चोल शासक राजराज चोल प्रथम ने बनवाया था. इसे पेरिया कोविल, राजराजेश्वर मंदिर या राजराजेश्वरम के नाम से भी जाना जाता है. द्रविड़ वास्तुकला का बेहतरीन उदाकांचीपुरम स्थित पल्लव राजसिम्हा मंदिर को देखकर राजराज चोल के मन में भगवान शिव के एक विशालकाय मंदिर के निर्माण की इच्छा जागृत हुई. इसके बाद सम्राट ने सन् 1002 में इस मंदिर की नींव रखी . आश्चर्य की बात है कि आज से हजारों साल पहले इतना विशाल मंदिर मात्र 5-6 सालों में बनकर तैयार हो गया था. मंदिर में लिखे लेखों से यह प्रमाण मिलता है कि राजराज चोल ने अपने जीवन के 19वें साल सन1001में इस मंदिर का निर्माण शुरू करवाया और सम्राट के 25वें साल सन1006के 275वें दिन इस मंदिर का निर्माण समाप्त हुआ.
 यह मंदिर द्रविड़ वास्‍तुकला का बेमिसाल उदाहरण है जिसे देखकर आप आश्चर्य चकित रह जायेंगे. यह अपने समय की विश्व की विशालतम संरचनाओं में से एक गिना जाता था,13 मंजिला बने इस मंदिर की ऊंचाई लगभग 66 मीटर है. मंदिर भगवान शिव की आराधना को समर्पित है.
करीब 216 फीट की ऊंचाई वाले इस मंदिर को 130,000 टन ग्रेनाइट के पत्थटरों से बनाया गया है. आश्च.र्य की बात यह है कि तंजौर में आस-पास 60 किमी तक न कोई पहाड़ और न ही पत्थमरों की कोई चट्टानें हैं. अब सवाल यह उठता है कि यह भारी-भरकम पत्थकर यहां आए कहां से और कैसे लाए गए. कहते हैं यहां 3 हजार हाथियों की मदद से इन पत्थगरों को यहां लाया गया था. पत्थ रों को जोड़ने में कोई सीमेंट, प्ला स्टरर, सरिया या फिर अन्यड किसी वस्तुम का प्रयोग नहीं किया गया है,बल्कि पत्थैरों को पजल तकनीक से आपस में जोड़कर तैयार किया गया है. मंदिर का मजबूत आधार इस प्रकार से तैयार किया गया है कि हजार साल बाद भी इतना ऊंचा मंदिर आज भी एकदम सीधा खड़ा है.
मंदिर का गुंबद अपने आप में एक आश्चीर्य है. यह एक विशालकाय पत्थबर से बना है. जिसका वजन 80 टन से भी अधिक है. उस जमाने में जब कोई क्रेन या लिफ्ट वगैरह नहीं थी, इतने विशाल पत्थ र को कैसे स्थाकपित किया गया होगा ? मंदिर में विशालकाय शिवलिंग को भी स्थािपित किया गया है..संभवतः इस कारण इसे बृहदेश्वर नाम दिया गया.

मंदिर की खास बात एक यह भी है कि यहां भगवान शिव की सवारी कहलाने वाले नंदी बैल की भी विशालकाय प्रतिमा स्थाापित है. इसे भी एक ही पत्थ र में से काटकर बनाया गया है. इसकी ऊंचाई 13 फीट है.
वैसे तो भारत के सभी मंदिरों की वास्तुकला अपने आप में सर्वश्रेष्ठ है. लेकिन वृहदेश्वर मंदिर की वास्तुकला न केवल विज्ञान और ज्यामिति के नियमों का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, बल्कि इसकी संरचना कई रहस्य भी उत्पन्न करती है. मंदिर का निर्माण द्रविड़ वास्तुशैली के आधार पर हुआ है.
इस मंदिर के निर्माण में ‘ग्रेनाइट’ के चौकोर पत्थर के ब्लॉक्स को यानि आकार में घटते क्रम में एक-दूसरे के ऊपर इस प्रकार जमाया गया कि वो आपस में फँसे रहें. इसे साधारण भाषा में ‘पजल टेक्निककहा गया. मंदिर का मुख्य भाग श्रीविमान कहलाता है जों लगभग 216 फुट  ऊँचा है. इसका मतलब हुआ कि पत्थर के ब्लॉक 216 फुट तक जमाए गए.

इस मंदिर से जुड़े कुछ रोचक तथ्य भी हैं, पहली बात तो यह है कि मंदिर के 50 किमी के दायरे में भी ग्रेनाइट उपलब्ध नहीं है तो इतनी मात्रा में ग्रेनाइट जहाँ से भी लाया गया होगा, निश्चित रूप से उस प्रक्रिया में खर्च हुई मेहनत और लागत की कल्पना भी नहीं की जा सकती है.
वृग्देश्वर मंदिर के श्रीविमान के ऊपर स्थित ‘कुंभम्’ किसी आश्चर्य से कम नहीं है. आश्चर्य इसलिए कि कुंभम् भी एक ही पत्थर से निर्मित है और उसका वजन है 81 टन अर्थात 81,000 किग्रा. अंदाजा लगाइए कि इतना वजनी पत्थर लगभग 200 फुट की ऊँचाई तक पहुँचा कैसे?
 कहा जाता है इसके लिए भी एक 6 किमी लंबा ‘रैम्प’  बनाया गया था जिसकी सहायता से हजारों हाथी और घोड़ों ने कुंभम् को श्रीविमान के ऊपर स्थापित किया था. इस कुंभम् के ऊपर भी एक स्वर्ण कलश स्थापित किया गया है. वास्तव में यह मंदिर अदभुत वास्तु कला का  अद्भुत नमूना है..

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