अदभुत प्रथा : पत्थर से लिंग जाँच की प्रथा
परिवेश May 27, 2020 at 11:57 PM , 666सामान्य तौर पर गर्भ में पल रहे शिशु के लिंग का पता करने के लिए सोनोग्राफी का सहारा लिया जाता है, लेकिन ये कानूनी तौर पर अपराध है. अगर कोई पैथालाजी लिंग जांच में पकड़ा जाता है तो उस पर कानूनी कार्यवाही की जाती है. लेकिन झारखंड में एक ऐसा इलाका है जहां आज भी लिंग जांच की प्राचीन प्रथा पर लोगों का अटूट विश्वास है. आज भी एक पहाड़ी से पत्थर फेंक कर गर्भस्थ बच्चे के लिंग जाँच की पंरपरा निभाई जाती है. परंपरा ऐसी कि जिसके बारे में जानकर आप दांतों तले उंगली दबा सकते हैं. झारखंड के लोहरदगा स्थित खुखरा गांव में एक ऐसी पहाड़ी है. यह पहाड़ी गर्भ में पल रहे नवजात लड़का है या लड़की इस बारे में बता देती है. वाकई अदभुत है यह प्रथा .
यहाँ के लोगों के अनुसार एक भी रुपये खर्च किए बिना हम यह पता कर लेते हैं गर्भवती महिला के पेट में लड़की है या लड़का. यह प्रथा यहां चार सौ साल पहले नागवंशी राजाओं के शासन काल से चली आ रही है. लोगों के मुताबिक ये पर्वत बीते 400 सालों से लोगों को उनके भविष्य के बारे में जानकारी दे रहा है. इस पर्वत के प्रति लोगों की बहुत श्रद्धा है. खुखरा गांव में गर्भवती महिलाओं के लिए चांद पहाड़ एक प्रमाणित वरदान है. इन महिलाओं को इस पहाड़ की ओर बस एक पत्थर फेंकना होता है. यह पत्थर बता देता है कि महिला के गर्भ में पल रहा शिशु बालक है या बालिका. पहाड़ पर चांद की आकृति खुदी हुई है. जिसपर एक निश्चित दूरी से निशाना लगाना होता है. अगर गर्भवती स्त्री के हाथ से छूटा पत्थर चांद की आकृति के भीतर जा लगे तो यह इस बात का संकेत है कि उस स्त्री को बालक शिशु होगा. लेकिन चांद आकृति से बाहर पत्थर लगने पर बालिका शिशु होगी. यह परंपरा यहां चार सौ साल पहले नागवंशी राजाओं के शासन काल से अब तक चल रही है जयंती देवी, जो दो पुत्रों की मां है, इस परंपरा पर अटूट विश्वास रखती हैं. क्योंकि उन्होंने दोनों ही पुत्रों के जन्म से पहले चांद आकृति के भीतर पत्थर मारने में सफलता पाई थी. 76 वर्षीय बुजुर्ग तुलसी दास बताते हैं कि उन्हें परंपरा की शुरूआत विषय में तो उनके बुजुर्ग जानकारी नहीं दे पाए थे लेकिन इसकी सार्थकता आज भी प्रामाणिक है. गांव के एक शिक्षक सरोज कुमार कहते हैं कि ग्रामीण परिवेश के कारण बहुत सी गर्भवती महिलाएं दूसरों की नजरों से बचकर चांद पहाड़ के पास पहुंचती और अपने आप में एक प्राकृतिक अल्ट्रासाउंड की तरह कायम परंपरा से अपने मन के कौतुहल को शांत करती हैं. शिशु के जन्म के बाद उनका विश्वास परंपरा के प्रति पक्का हो जाता है. स्थानीय लोगों के अनुसार चांद पहाड़ मूल रूप से नागवंशी राजाओं के मनोरंजन के पार्क के रूप में विकसित किया गया था. पहाड़ के ऊपर शिवलिंग और कुंड जैसी आकृतियां गवाह हैं कि वहां नागवंशी राजा पूजा पाठ भी करते थे। इसके ठीक बगल में चांदनी पहाड़ है. जिसमें नागवंशी रानियां विहार करती थी.
आज दुनिया के लोग चाँद तारों की खोज में लगे है तो कुछ लोग अज भी अपनी प्राचीन परम्पराओं को छोड़ने को तैयार नहीं.































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