*कलम के सिपाही न्याय की आस*
परिवेश May 30, 2021 at 11:30 AM , 512सभी संगठन शिक्षक हित में एकजुट होकर अपने खोए हुए साथियों को न्याय दिलाने का प्रयास करें क्योंकि *बंधी हुई लकड़ियों के ढेर में ही बल होता है अलग-अलग लकड़ी में नहीं*। हमारे जो शिक्षक भाई-बहन आज हमारे बीच नहीं हैं कोरोना महामारी की भीषण विभीषिका के शिकार हो गए हैं उनके परिवारों को नौकरी मिल सके उन्हें उचित सरकारी सहायता मिल सके इस हेतु प्रयास करें।
उनकी जगह स्वयं को रख कर देखें यदि आप इस दुनिया में ना होते तो क्या अपने परिजनों को चंदे का पैसा दिलाना पसंद करते निश्चित रूप से नहीं?? तो फिर जो चले गए उनकी भावनाओं और उनके परिवार के सम्मान के साथ खिलवाड़ क्यों?????
आज हक और अधिकार की लड़ाई है इस समय हजारों *कोरोना महामारी की भेंट चढ़े है वह भी चुनाव ड्यूटी करने के कारण चुनाव में ड्यूटी कराना सरकार का काम था इसलिए अब परिवारों को मुआवजा देना अभी सरकार का काम है.......* ... संगठनों का काम सरकार से अधिकार के लिए लड़ना है आज सरकार मृतक शिक्षकों की संख्या मात्र तीन मान रही है जो कि शायद इस वर्ष का सबसे बड़ा मजाक होगा।
शिक्षकों का नियोक्ता अधिकारी बीएसए होता है संगठन स्तर पर अपने बीएसए से सभी लोग सूची एकत्र करें और कुल जितने भी शिक्षक इस दौरान काल के गाल में समा गए उन्हें चिन्हित करें। उनके परिवारों को उचित आर्थिक सहायता , सम्मान राशि दिलाने हेतु संगठन और उनके रसूख का प्रयोग करें।
सरकार की अवहेलना के बाद भी शिक्षक समाज अभी हारा नहीं है ना कि बेबस और लाचार हुआ कीअपने ही जेब से चंदा देकर शिक्षक परिवारों को चंदे के रूप में सहानुभूति दे........... (विषम परिस्थितियों में यदि कोई है तो उसे मदद करने के लिए सभी शिक्षक खड़े हैं)
शिक्षकों की मृत्यु सरकार की कमी के कारण हुई है इतनी विषम परिस्थितियों में यदि शिक्षकों की ड्यूटी चुनाव में तथा अन्य कोविड से जुड़ी हुई चीजों में ना लगाई जाती तो हमारे शिक्षक भाई और बहन आज हमारे बीच उपस्थित होते उनका परिवार संकट में ना फसा होता है। मार्च के अंत से लेकर मई तक जितनी भी मृत्यु हुई है उनका अमूमन कारण कोरोना महामारी ही है यह बात अलग है कि हमारे कई शिक्षक ना तो अपनी जांच करा पाए, न हीं अस्पताल तक जा पाए और ना ही चिकित्सक परामर्श मिल सका जिसके कारण उनके पास अपनी मृत्यु का कोई सबूत नहीं है। क्या मानवीय संवेदना को ध्यान में रखते हुए सरकार जल्द से जल्द आश्रितों को नौकरी और सहायता नहीं दे सकती?? अभी हाल ही में मैंने एक तस्वीर में आदरणीय शिक्षा मंत्री जी को एक महिला को नियुक्ति पत्र देते हुए देखा था पर आज तक समझ ना पाई कि हजारों मृत शिक्षकों में सिर्फ एक महिला को ही नियुक्ति पत्र क्यों दिया गया??????
अन्य शिक्षकों की परिस्थितियों की जांच क्यों नहीं की जा रही हम सभी कहीं ना कहीं से किसी ना किसी शिक्षक को जानते ही थे उनकी परिवारिक परिस्थितियों को जानते हुए परिस्थितियों को सामान्य होने पर उनके घर जाकर पूरी स्थिति की जानकारी लेनी चाहिए।
लाखों शिक्षक मिलकर यदि उसने मुट्ठी भर साथियों को न्याय ना दिला पाए तो वाकई शर्म की बात है।
मांग पत्रों के द्वारा सरकार से लगातार मृतक आश्रितों और उनके बिलखते परिवारों को न्याय मिले इसकी गुहार लगाने चाहिए साथ ही हर एक शिक्षक अपनी महती जिम्मेदारी समझते हुए उस महामारी के शिकार हुए शिक्षक का साथ दें यह सोच कर कि यदि उनकी जगह हम होते तो क्या होता????
अतः मुआवजा सरकार को देना पड़ेगा सर्वोच्च न्यायालय हो चुका है एक करोड़ का मुआवजा देना होगा...... सभी संगठनों को पूरी ताकत लगाकर अपने साथियों को न्याय दिलाना चाहिए।
मांग पत्र का एक सामान्य विषय होना चाहिए......
*निर्वाचन ड्यूटी के दौरान संक्रमित होकर प्राण गंवाने वाले कर्मचारियों व शिक्षकों के परिवार को सरकारी सहायता के विषय में*
1.निर्वाचन ड्यूटी करने वाले कर्मचारियों व शिक्षकों को सरकार फ्रंटलाइन वर्कर घोषित करे और फ्रंटलाइन वर्कर को कोरोना वायरस के कारण जान गवाने पर उसके परिवार को वह सभी सुविधाएं दी जाए जो चिकित्सा, स्वास्थ्य, सफाई पुलिस आदि पूर्व घोषित फ्रंटलाइन वर्कर सेवा में दी जा रही है।
2.निर्वाचन ड्यूटी को फ्रंटलाइन वर्कर ड्यूटी मानने के बाद सारे विवाद स्वत: समाप्त हो जाएंगे और निर्वाचन के दौरान संक्रमित होकर जान गवाने वाले सभी कर्मचारियों शिक्षकों को सरकार को तदनुसार 50 लाख रुपए का कम्पेनसेशन देना चाहिए। मा उच्च न्यायालय के अनुसार तो 01 करोड़ रु का कंपनसेशन दिया जाना चाहिए।
3.जहां तक मृतक आश्रित के सेवायोजन की बात है तो मृतक आश्रित के सेवायोजन का नियम 50 साल पुराना है जिसमें कोरोना से मृत्यु होने पर संशोधन किया जाना समय की महती आवश्यकता है। कोरोना के कारण जान गवाने वाले मृत कर्मचारी या शिक्षक के आश्रित को उसकी योग्यता के अनुरूप सेवायोजन दिया जाना चाहिए तब मृतक परिवार के साथ थोड़ा बहुत न्याय हो पाएगा। अन्यथा चतुर्थ श्रेणी का सेवायोजन या कुछ सीमित तृतीय श्रेणी का सेवायोजन न्यायपूर्ण नही है। कई परिवार पूरी तरह समाप्त हो गये है, कोई कमाने वाला नही बचा है। यदि ऐसे परिवार का कोई बच्चा एमबीए या बी टेक या उच्च शिक्षा प्राप्त है तो क्या वह तृतीय/चतुर्थ श्रेणी की नौकरी करने को मजबूर होगा और उसके सारे सपने और भविष्य समाप्त नही हो जाएगा ? अतः कोविड-19 से मृत्यु के बाद आश्रित सेवायोजन की नियमावली तत्काल उपरोक्तानुसार बदली जानी चाहोये।
यदि सभी कर्मचारी व शिक्षक संगठन इस बात से सहमत हों तो सबको अलग-अलग इसी आशय का पत्र माननीय मुख्यमंत्री जी को प्रेषित करना चाहिए और सामूहिक रूप से भी एक बैठक कर ऐसा प्रस्ताव सरकार को दिया जाए और आगे की रणनीति तय की जाए। यह मेरा सुझाव है ।
,@रीना त्रिपाठी
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