नदी सभ्यताओं एवं विरासत संरक्षण पर लखनऊ में होगा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन

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लखनऊः 23 सितम्बर, 2026


उत्तर प्रदेश की समृद्ध नदी सभ्यताओं, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक विरासत तथा इनके संरक्षण, प्रबंधन और विकास से जुड़े समसामयिक विषयों पर व्यापक विमर्श के लिए 7 एवं 8 दिसम्बर, 2026 को लखनऊ में दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन ^Riverine Civilizations and Conservation: UP and Adjacent Areas* का आयोजन किया जाएगा। सम्मेलन की केंद्रीय विषयवस्तु ‘नीति, प्रबंधन एवं विकास के मुद्दे’ पर केंद्रित होगी।
यह सम्मेलन माननीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री जयवीर सिंह की प्रेरणा तथा अपर मुख्य सचिव, संस्कृति, पर्यटन एवं धर्मार्थ कार्य विभाग, उत्तर प्रदेश शासन श्री अमृत अभिजात, IAS के मार्गदर्शन में उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय, लखनऊ एवं डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय, लखनऊ के वास्तुकला एवं नियोजन संकाय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है। सम्मेलन का आयोजन विश्वेश्वरैया हॉल, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय, जानकीपुरम विस्तार, लखनऊ में होगा।
उत्तर प्रदेश एवं इसके समीपवर्ती क्षेत्रों की नदी घाटियां प्राचीन काल से ही मानव सभ्यता के विकास की महत्वपूर्ण आधारभूमि रही हैं। गंगा, यमुना, गोमती, घाघरा और बेतवा जैसी प्रमुख नदियों के तटों पर अनेक पुरातात्विक स्थल, ऐतिहासिक नगर, तीर्थ एवं सांस्कृतिक केंद्र विकसित हुए हैं। इन नदी प्रणालियों ने न केवल मानव बस्तियों और आर्थिक गतिविधियों को आकार दिया, बल्कि क्षेत्र की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सम्मेलन में नदी और मानव सभ्यता के इस बहुआयामी संबंध के साथ-साथ नदी आधारित पुरातात्विक परिदृश्य, सांस्कृतिक स्मृति, विरासत एवं तीर्थ मार्ग, पारंपरिक भारतीय ज्ञान प्रणालियां, नदी संरक्षण, बाढ़ क्षेत्र प्रबंधन, आपदा जोखिम न्यूनीकरण, जनभागीदारी तथा जल प्रणालियों से संबंधित नीतियों एवं शासन व्यवस्था जैसे विषयों पर विशेषज्ञों एवं शोधकर्ताओं द्वारा विचार-विमर्श किया जाएगा।
सम्मेलन के लिए दो प्रमुख विषय निर्धारित किए गए हैं। प्रथम विषय ‘पुरातत्व, विरासत एवं पारंपरिक ज्ञान’ के अंतर्गत पुरातात्विक परिदृश्य एवं सांस्कृतिक स्मृति, सांस्कृतिक एवं तीर्थ मार्ग तथा विरासत परिपथ और पारंपरिक भारतीय ज्ञान प्रणालियों से संबंधित शोध प्रस्तुत किए जाएंगे। द्वितीय विषय ‘प्राचीन कालीन निर्मल नदियां: शासन एवं नीतिगत परिप्रेक्ष्य’ के अंतर्गत समुदाय की भागीदारी, हितधारकों की सहभागिता, बाढ़ क्षेत्र प्रबंधन, आपदा जोखिम न्यूनीकरण तथा जल प्रणालियों के लिए नीति एवं शासन के विभिन्न प्रारूपों पर चर्चा की जाएगी।
सम्मेलन में देश-विदेश के पुरातत्वविदों, इतिहासकारों, वास्तुविदों, संरक्षण विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, योजनाकारों एवं संबंधित विषयों के विशेषज्ञों को आमंत्रित किया जा रहा है। सम्मेलन के लिए मौलिक एवं अप्रकाशित शोध-पत्र आमंत्रित किए गए हैं। शोध-पत्र का सारांश 300 से 500 शब्दों तथा 5-6 प्रमुख शब्दों के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है। पूर्ण शोध-पत्र 5,000 से 6,000 शब्दों का होना चाहिए।
पूर्ण शोध-पत्र प्रस्तुत करने की अंतिम तिथि 30 अक्टूबर 2026 निर्धारित है। शोध-पत्र की स्वीकृति की सूचना 15 नवम्बर 2026 को दी जाएगी, जबकि संशोधित शोध-पत्र 30 नवम्बर 2026 तक जमा किए जा सकेंगे। सम्मेलन के लिए पंजीकरण की अंतिम तिथि 25 नवम्बर 2026 है तथा पंजीकरण शुल्क 1,000 रुपये निर्धारित किया गया है। सम्मेलन में स्वीकृत शोध-पत्रों को ‘प्रागधारा’ के आगामी खंड में सम्मिलित किए जाने की व्यवस्था की गई है। इच्छुक शोधकर्ता अपने शोध-पत्र निम्न ई-मेल पते पर भेज सकते हैं- riverbasincivilization@foapaktu.ac.in, seminar.upsad@gmail.com  अधिक जानकारी के लिए श्री राम विनय, 9415159188 एवं 7408129000 तथा आर्किटेक्ट अनुपमा भारती, 8707348004 से संपर्क किया जा सकता है।
यह अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन उत्तर प्रदेश की नदी सभ्यताओं और उनसे जुड़ी पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ-साथ नदी, विरासत, पर्यावरण, समाज और विकास के बीच समन्वय स्थापित करने की संभावनाओं पर राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सार्थक विमर्श का मंच प्रदान करेगा।

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