अतीत की पीड़ाओं की प्रतिध्वनियाँ

हेडलाइंस , 660

अतीत का मोहपाश चाहे वांछनीय हो या अवांछनीय पीछा नहीं छोड़ता। यह दुर्वासा मुनि के शाप जैसा होता है। यही मोह एक दिन छद्म रचता है। मैंने भी यही किया। अतीत का मार्ग ऋजु नहीं होता। वहाँ अनगिन वक्रताएँ होतीं हैं। वहाँ भटकने की संभावना कोई अचरज नहीं। विगत की कई स्मृतियाँ वहीं से झरतीं हैं। अंततः अतीत मास्क में मेरे सामने वाली कुर्सी पर था। मेरे पास प्रश्न थे। प्रश्न क्या वंचनाओं का एक ढाँचा था, जिसको मैंने अकादमिक रँग से पोत दिया था। वह सतत् सुनता गया। प्रयुत्तर के नाम पर उसके पास कुछ नहीं था। कुछ था तो अवसाद में गहरी धँसी आंखों की एक जोड़ी थी। बातें जो कभी पातियों में आई-गई हो गयीं थीं, चुप्पियाँ बनकर हमारे बीच पड़े अंतराल में घुल रहीं थीं। सघनता थी, एक गहरा ठहराव था - कहने को बस शब्द ही नहीं बचे थे। पराये लोगों से घिरा हुआ अतीत एकदम नहीं खुल पाता। कभी-कभी तो वह बिल्कुल भी निर्वाक् रहता है। 

आवाज़ में एक स्थायी विषणा थी। कितना कुछ ग्रंथित किया गया। एक विप्लव भरा-भरा सा ... बस छलका नहीं। नियंत्रण और नियमन के सारे सिद्धान्त यहाँ आकर खोखला गये थे।

अतीत का यह संज्ञान कि समक्ष बैठा व्यक्ति छल कर रहा था, प्रकट नहीं हुआ। मैं संपृक्ति तोड़ने वाला व्यक्ति, वह टूटे तारों के लिए जार-जार आँसू बहाने वाला .... आज दोनों समकक्ष खड़े थे। कोई शिकायत नहीं किसी की। एक भाव जिसे भीतर से अनुभूत किया और भीतर ही रहने दिया। 

पाँव पर पाँव धरता अतीत, प्रश्न करता मैं। 
बोलता मैं, आँखों से उत्तर देता अतीत। 

कुछ बातें तटबंध तोड़ती अच्छी नहीं लगतीं। नहीं तो वे बेपरवाह होकर बहतीं हैं या फिर ख़त्म हो जातीं हैं। 

इतने में कहाँ मानता ? कुछ अभीप्साएँ रिक्शे में बैठकर कार में सवार सपनों का पीछा करतीं हैं। हासिल यहाँ कोई मुद्दा ही नहीं। रेत अपनी मुट्ठी में भरना और अँजुरी से गिरते हुए देखना ... 


प्रफुल्ल सिंह "बेचैन कलम"
युवा लेखक/स्तंभकार/साहित्यकार
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
सचलभाष/व्हाट्सअप : 6392189466
ईमेल : prafulsingh90@gmail.com

Related Articles

Comments

Back to Top