राज्य सूचना आयोग में नियुक्त किये जाने वाले आयुक्तों की लिखित परीक्षा कराये जाने की मांग
अन्य खबरे Jan 31, 2024 at 07:57 PM , 206लखनऊ।
मुख्य मंत्री को एक पत्र भेजकर मांग किया गया हैं कि राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त तथा दस अन्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही हैं। इस सम्बन्ध में अवगत कराना हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने बीते दिनों राज्य उपभोक्ता आयोगों व जिला उपभोक्ता फोरमों में अध्यक्षों व सदस्यों की नियुक्ति के लिए लिखित परीक्षा कराने का दिशा निर्देश जारी किया हैं। उसी के अनुरूप राज्य सूचना आयोग के लिए भी योग्य, अनुभवी तथा एक्ट की बारीकियों के जानकारों की नियुक्ति के लिए अभ्यार्थियों की लिखित परीक्षा कराने की मांग किया हैं। राज्य सूचना आयोग के आयुक्त लोगों को भी अपीलों/शिकायतों कर सुनवाई के दौरान सिविल एक्ट के तहत अधिकार प्राप्त होते हैं। अतः न्यायिक प्रक्रिया के तहत कार्य करने वाले आयुक्त लोगों को भी न केवल सामान्य ज्ञान, कानून, अधिनियम की जानकारी होनी आवश्यक हैं बल्कि सूचना का अधिकार सम्बन्धी अधिनियम नियमावली के प्रावधानों की विशेष जानकारी होना भी आवश्यक हैं।
अभी तक देखने में आया हैं कि तैनात आयुक्त लोगों में न तो एक्ट की पर्याप्त जानकारी थी और न ही एक्ट व शासन की मंशा के अनुरूप अपने कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी का एहसास था जिसके कारण उनके कार्य जनहित में न होकर व्यक्तिगत स्वार्थो की पूति में अधिक होता रहा। इसी कारण वर्तमान सत्र के आयुक्त लोग काफी विवादित रहे हैं। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने, अधिकारियों की कार्यो के प्रति जिम्मेदारी निर्धारित करने के बजाय अधिकारियों के मनमाने कार्यो को आयोग द्वारा सिर्फ संरक्षण ही नहीं दिया गया बल्कि प्रोत्साहित भी किया गया और न्याय पाने तथा शासन-प्रशासन के कार्यो में अपनी भागीदारी निभाने, अधिकारियों के कार्यो पर नजर रखने के मंसूबों को लेकर प्रदेश के दूर दराज से आने वाली जनता अधिकाशतः निराश ही होती रही हैं। आयुक्त लोगों के कार्य करने के तरीके जनता के हित में न होकर उनके सामन्तीप्रवृति के अनुकूल रहा। वर्तमान आयुक्त लोगों ने दूर दराज से आने वाली जनता की कठिनाईयों, कष्टों को कभी भी संज्ञान में नहीं लिया बल्कि अपने मनमुताबिक समय-बेसमय आने, एक ही दिन में दो सौ, तीन सौ केसों को लिस्ट कर पेशकारों, स्टेनों के भरोसे छोड़कर एक लाइन से निस्तारित करना, अपीलार्थियों की आपत्तियों, बातों, प्रार्थनापत्रों को संज्ञान में लिए बिना ही प्रकरण का निस्तारण करना, दण्ड अधिरोपित करने के पश्चात बिना किसी आधार के दण्ड अधिरोपण आदेश को वापस लेना, महीनों-महीनों आदेशों को बेबसाइड पर अपलोड नहीं करना, चेम्बर में मिलने वाले अधिकारियों को संरक्षण देना, बिना वांछित सूचनाएं उपलब्ध कराएं ही केस को निस्तारित कर देना, तीन-तीन साल से आयोग की वार्षिक रिर्पोट नहीं बनना, आयोग में लगे सूचना पटों पर पुरानी जानकारी ही प्रदर्शित करना, आयोग को प्राप्त होने वाले फण्ड का दुरपयोग होना, स्वंय आयोग की बेबसाइड पर भी वर्षो पुरानी जानकारी ही प्रदर्शित होना, आयोग को लिखे पत्रों का जवाब नहीं देना, जन सूचना अधिकारी द्वारा भी केवल औपचारिकता पूरी कर जनता कें पैसों की बर्बादी करना आदि आयोग, आयुक्त लोगों में व्याप्त भ्रष्टाचार की कहानी ही बयाॅ करता हैं।
सम्भवतः माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इसी तरह की लापरवाही आदि देखने के बाद आयोगों फोरमों में नियुक्त होने वाले सदस्यों के लिए लिखित परीक्षा ही अनिवार्य नहीं किया बल्कि उनके लिए अनुभवी होना भी आवश्यक कर दिया हैं।
प्रदेश के मुख्य मंत्री जी जब पारदर्शिता, योग्यता, अनुभवी की बात करते हैं तो यह आवश्यक हैं कि प्रदेश के राज्य सूचना आयोग में भी पारदर्शिता तरीके से योग्यता एंव अनुभव के आधार पर ही नियुक्ति किये जाने के लिए अभ्यार्थियों की लिखित परीक्षा कराया जाना चाहिए ।



























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