अदभुत किला ; जिसकी दीवार रोती है खून के आंसू
परिवेश Aug 14, 2023 at 06:21 AM , 1180अमरेन्द्र सहाय अमर
क्या आप विश्वास करेंगे कि एक किले की दीवार से आज भी खून के आंसू निकलते है .शायद आप विश्वास न करें परन्तु यह सच है.
हिंदी का एक मुहावरा ‘खून के आंसू रोना’ तो आपने सुना ही होगा. बेबसी को बयां करने के लिए यह मुहावरा अक्सर इस्तेमाल किया जाता है. मगर क्या कभी आपने सुना है कि किसी महल या किले की दीवार खून के आंसू रोती हो !रात के समय किले से आने वाली रहस्यमय आवाजों से दूर-दराज के इलाकों तक के लोग सिहर जाते हों !मध्य प्रदेश में एक ऐसा ही किला है, जिसके बारे में इतनी दंतकथाएं प्रचलित हैं कि उसे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे. एमपी के मुरैना जिले में स्थित सबलगढ़ के किले की ऐसी ही रहस्यमयी बातें आपको हैरान कर देंगी. इस किले के रहस्यों के पीछे कौन सी कहानी छुपी है, आइए इस बारे में जानते हैं!
मुरैना के सबलगढ़ नगर में स्थित यह किला मुरैना से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर है. मध्यकाल में बना यह किला एक पहाड़ी के शिखर बना हुआ है. इस किले की नींव सबल सिंह गुर्जर ने डाली थी जबकि करौली के महाराजा गोपाल सिंह ने 18वीं शताब्दी में इसे पूरा करवाया था. कुछ समय बाद सिंकदर लोदी ने इस किले को अपने नियंत्रण में ले लिया था लेकिन बाद में करौली के राजा ने मराठों की मदद से इस पर पुन: अधिकार कर लिया.1795 ईसवीं में यह फिर से राजा खांडे राव द्वारा ले लिया गया था, जिसका घर वहाँ है. लॉर्ड वेलेजली दौलत राव सिंधिया अपने शासनकाल सन 1764 से 1837 में इस किले में रहते थे. किले को 1804 में अंग्रेजी द्वारा जब्त कर लिया गया था. किले के आसपास के क्षेत्र को सन1809 में सिंधिया राज्य में जोड़ा गया था.
सबलगढ़ किला राजस्थानी शैली में बनाया गया है. इसके तीन मुख्य द्वार हैं, और कई मंदिर किले के भीतर स्थित हैं, जैसे कि जगन्नाथ मंदिर. यह परिसर अठारहवीं शताब्दी के किले की योजना का एक अच्छा उदाहरण है. यह उत्तर और पश्चिम की ओर बाहरी किले की दीवार से घिरा हुआ था. राज्य राजमार्ग के उत्तर की ओर 1,800 मीटर लंबी एक सतत किलेबंदी की दीवार देखी जा सकती है, जबकि किलेबंदी के कुछ छोटे हिस्से पूर्व की ओर देखे जा सकते हैं. पूर्व और पश्चिम की ओर प्राकृतिक सुरक्षा के रूप में घने जंगल हैं. दक्षिणी किनारे पर एक खाई के अवशेष भी हैं. उत्तर में चंबल नदी और पश्चिम में तलहटी में नाले ने किले के स्थान को और अधिक अनुकूल बना दिया. आंतरिक किले की दीवार 12 बुर्जों से मजबूत है और इसमें पांच प्रवेश द्वार हैं. उत्तर की ओर का प्रवेश द्वार किले में मुख्य प्रवेश द्वार प्रतीत होता है, और बाहरी और आंतरिक बस्ती के बीच संबंध का काम करता है. आंतरिक किले में महल, जनरलों और अभिजात वर्ग के लिए निवास नवल सिंह हवेली, अस्तबल, कचहरी और मंदिर जैसी अन्य सहायक इमारतें थीं, जबकि बाकी बस्ती दो किले की दीवारों के बीच थी. बस्ती में पानी के लिए कई कुएँ थे और वे आंतरिक और बाहरी दोनों किलेबंदी में स्थित थे.
17वीं शताब्दी में बना सबलगढ़ किला अपने भीतर कई ऐतिहासिक तथ्य समेटे है. इस किले ने कई राजाओं-महाराजाओं के तख्त और ताजों को आसमान चूमते और फिर मिट्टी में मिलते हुए देखा है. लगभग 4 सदी पुराना यह किला आज भी शान से सिर उठाए खड़ा है, मगर अफसोस की बात यह है कि इस ऐतिहासिक धरोहर को आस-पास के लोग इसे गर्व से नहीं, बल्कि खौफ से देखते हैं. इसके बारे में प्रचलित कहानियां ऐसी हैं कि साहसी इंसानों के भी पसीने छूट जाएं.
स्थानीय लोगों का दावा है कि इस किले की एक दीवार से खून टपकता है. यानी यहां पत्थर भी खून के आंसू रोते हैं. किले के आस-पास के इलाके में रहने वालों को रात के वक्त यहां से रोने की आवाजे सुनाई देती हैं. वास्तुकला और शिल्पकला के शानदार नमूने के तौर पर इसकी विशालता और सुंदरता देखकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं. मगर किले से जुड़ी कहानियां इसके ऊपर ऐसी चस्पा हो चुकी हैं कि रात में तो दूर, लोग दिन के समय भी इस किले में जाने से लोग
स्थानीय बुजुर्ग इस किले के इतिहास के बारे में बताते हैं कि कभी यहां राजा और रानी अपने पूरे कुनबे के साथ रहा करते थे. किले के भीतर हर समय रौनक और चहल-पहल रहा करती थी. मगर आज की तारीख में यह किला वीरान पड़ा है. किले के चौकीदार ने बताया कि इस किले में एक पत्थर है, जो खून के आंसू रोता है. कहानी है कि इस किले के राजा के बेटे की उसके दुश्मनों ने दीवार पर सिर मार-मारकर हत्या कर दी थी. तभीसे उस पत्थर से खून टपक रहा है. गांव के बुजुर्गों ने अपनी आंखों से उस दीवार से खून के आंसू निकलते देखे भी हैं. गांववाले मानते हैं कि राजा के बेटे की रूह को मुक्ति नहीं मिली, इसलिए दीवार से आज भी खून निकलता है.































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