“सत्य प्रधान सम्पूर्णत्त्व वाला जीवन ही सच्चा ‘धर्म’ है!’’ महात्मा रामाधार जी

लखीमपुर खीरी , 570

महाकुंभ मेला प्रयागराज/लखीमपुर। सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस द्वारा संस्थापित संस्था सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्त्वावधान में महाकुंभ मेला हरिश्चंद्र चौराहा स्थित शिविर में सत्संग सुनाते हुए महात्मा रामाधार दास ने कहा- कोई भी पन्थ, सम्प्रदाय तथा अनेक मत मतान्तर धर्म का नाम नहीं है, उसी तरह से कण्ठी माला पहनना, वस्त्र पहनना आदि धर्म नहीं है । दोष रहित, सत्य प्रधान , उन्मुक्त अमर जीवन पद्धति ही धर्म है, धर्म उस विधान का नाम है जिससे हमें बार बार के जनम-मरण के चक्कर से, इस भव सागर से छुटकारा मिल जाता है । 
उन्होंने कहा कि मनुष्य का शरीर इस सृष्टि में परमेश्वर का दिया हुआ सबसे श्रेष्ठ सबसे सर्वोत्तम शरीर है, मनुष्य जीवन का एकमेव एक लक्ष्य परमात्मा परमेश्वर को प्राप्त करके अपने जीवन को मुक्ति-अमरता से युक्त भगवद् भाव प्रधान वाला बनाए रहना है। धर्म और मोक्ष के बीच का जीवन एक सर्वोच्च और सम्पूर्णत्त्व वाला जीवन है क्योंकि ऐसे जीवन का रख-रखाव और मालिकान स्वयं परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान् के पास रहता है । महात्मा जी ने कहा की जन समाज को इसी प्रकार का जीवन जीना चाहिए जिससे अमन चैन सुख शान्ति के साथ चारो तरफ खुशहाली वाला समाज कायम हो।

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