“गीता बुद्धि और मन से परे, तत्त्वज्ञान का प्रायौगिक सद्ग्रन्थ" _ मोहनदास

लखीमपुर खीरी , 584

महाकुंभ मेला प्रयागराज/लखीमपुर।
 स्वामी सदानन्द जी परमहंस द्वारा संस्थापित संस्था सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्त्वावधान में महाकुंभ मेला हरिश्चंद्र चौराहा स्थित शिविर में सत्संग सुनाते हुए महात्मा मोहन दास ने कहा- जहाँ भगवदवतारी श्रीकृष्ण जी की वाणी श्रीमद्भगवद्गीता सम्पूर्ण अर्थात संसार व शरीर सहित जीव एवं ईश्वर और परमेश्वर पांचो स्तंभों को सम्पूर्णतया अर्थात शिक्षा, स्वाध्याय एवं योग-साधना अथवा अध्यात्म और तत्त्वज्ञान नामक चार विधानों के द्वारा अलग-अलग बात-चीत सहित साक्षात् दर्शन से सम्बन्धित एक सम्पूर्ण प्रायौगिक सद्ग्रन्थ है, गीता को कोई भी अपने मन-बुद्धि एवं विचारों से नहीं समझ सकता !
महात्मा जी ने कहा कि किसी भी सद्ग्रन्थ के दोहा-चौपाई-श्लोक-मन्त्र के पढ़ने या पाठ करने मात्र से मोक्ष तो मिलता ही नहीं, ‘ज्ञान’ भी नहीं प्राप्त हो सकता । मोक्ष का हेतु तो एकमात्र ‘ज्ञान (तत्त्वज्ञान)’ है जिसे प्राप्त करने के लिये भगवान् श्रीकृष्ण जी ने गीता के श्लोक 4/34 के अनुसार ज्ञानाभिलाषी को किसी कर्मकाण्डी या कथावाचक या मन्त्रदाता गुरु के शरण में नहीं, किसी योग-साधना वाले या आध्यात्मिक गुरु के शरण में भी नहीं अपितु तत्त्वज्ञान देने वाले तत्त्ववेत्ता सद्गुरु के शरण में जाने के लिये और उनकी सेवा करते हुये उन्हें प्रसन्न करके  श्रद्धापूर्वक भगवत् समर्पित-शरणागत भाव से प्रश्न करते हुये उस ‘तत्त्वज्ञान’ को पाने के लिये कहा है जिसके प्राप्त होते ही परमात्मा को तत्त्वतः जानने एवं साक्षात् देखने और तत्त्वज्ञान से उनमें प्रविष्ट होने के साथसाथ विराटरूप दर्शन तथा मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध की प्राप्ति हो जाती है । ऐसा ‘ज्ञान’ यदि नहीं प्राप्त हो रहा हो तो ज्ञानाभिलाषी को समझना चाहिये कि उसे अभी सद्गुरु की प्राप्ति नहीं हुई है।

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