*घर-गृहस्थ में रहकर कोई मुक्ति अमरता नहीं पा सकता । --सन्त ज्ञानेश्वरजी ।*

लखीमपुर खीरी , 390

प्रयागराज/लखीमपुर।                 
   सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के पण्डाल में चल रहे सत्संग कार्यक्रम में सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस के शिष्य महात्मा दशरथ 
जी ने कहा, मुक्ति-अमरता घर-परिवार में रहकर कदापि प्राप्त नहीं किया जा सकता । इसलिए सच्चा सन्त कभी भी किसी को भी घर-परिवार में रहने की छूट नहीं दे सकता । कोई भी घर-परिवार में रहकर किसी प्रकार का भी पारलौकिक उपलब्धि हासिल नहीं कर सकता, जितने भी महापुरुष हमारे समाज में हुए हैं घर-परिवार में रहकर नहीं हुये है, जैसे गौतम-महाबीर-नानक-ईसा-मूसा-मुहम्मद आदि-आदि महापुरुषों ने भी घर-परिवार को छोड़कर ही समाज में मर्यादित-पूजनीय हुये हैं । घर-परिवार में रहकर महापुरुष बनने की बात तो दूर रही सांसारिक पद जैसे डाक्टर-इन्जीनियर-अधिकारी भी बनना हो तो घर से  दूर रहकर पढ़ाई करना पड़ेगा। ‘‘गगन मण्डल के बीच से झर-झर पड़े अंगार, सन्त न होते जगत में तो जल मऱता संसार’’ सन्त उस क्षमता शक्ति का नाम है अगर धरती जल रही होगी तो वह चाहे तो वर्षा करा देगा,  असली सन्त रहेगा विकट से विकट परिस्थिति को सहज बना देगा । सन्त सत्ता-शक्ति का प्रयोग जानता है । आजकल जो सन्त का वेश बना लिये भीख मांगने के लिए मेहनत से श्रम से  बचने के लिये और अपने पेट का धन्धा करने के लिये, ये आलसी लोग जब सन्त माहत्मा का वेश ले लेगें जिसको ईश्वर-परमेश्वर से कोई मतलब नहीं है वही लोग घर-गृहस्थ वालों का चाटुकारिता करते हैं ताकि उनसे उनका जीवन निर्वाह हो जाये । यदि कोई सन्त-महात्मा घर-गृहस्थीयों का आशा करते हैं तो वास्तव में सन्त महात्मा नहीं वह आडम्बरी-पाखण्डी है।

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