“हम’ को जाननें-देखनें के लिए मिला है मनुष्य जीवन। हमको जाने बिना कर्तव्य कैसा? -- सन्त ज्ञानेश्वरजी ।”
लखीमपुर खीरी Jan 13, 2025 at 06:05 PM , 149प्रयागराज/लखीमपुर।
सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस द्वारा संस्थापित संस्था सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्त्वावधान में महाकुंभ मेला हरिश्चंद्र चौराहा स्थित शिविर में सत्संग में बोलते हुए महात्मा महेंद्रानन्द ने कहा जब तक हम अपने को अर्थात शरीर में रहकर हम-हम-हम करने वाला को जाने-देखेंगें नहीं कि हमारा अस्तित्व क्या है ? तब तक हमारा कर्तव्य कैसे मालूम होगा कि हमें क्या करना है ? जब कर्तव्य ही नहीं मालूम कि क्या करना है तब जिम्मेदारी कैसी ? सर्वप्रथम हम को जानना -देखना है कि ‘हम’ क्या है ? जब हम को जानकारी होगी कि हम फला है तब ही कर्तव्य निधारण होगा जैसे कोई भी विभाग में चार स्तर के कर्मचारी होते हैं पहला प्रथम वर्ग के अधिकारी, दूसरा वर्ग के कर्मचारी, तीसरे वर्ग के क्लर्क, चौथे वर्ग के चपरासी जब तक हम को मालूम नहीं होगा कि हम किस वर्ग के कर्मचारी हैं तो हम कार्यालय में जाकर के कहाँ बैठ कर क्या करेगें ? इसलिए कार्यालय में जाने से पहले हम को ये जानकारी होना आवश्यक है कि हम किस वर्ग के कर्मचारी हैं तब ही कार्यालय का कार्य का निर्धारण हो सकता है । ठीक उसी प्रकार ‘हम’ को जानना आवश्यक है ‘हम’ शरीर है कि, ‘हम’ जीव है कि, हम आत्मा-ईश्वर-ब्रम्ह-शिव है कि, ‘हम’ परमात्मा- परमेश्वर-परमब्रम्ह है । जब हम जानेंगे कि हम फला हैं तब ही हमारे कर्तव्य का निर्धारण हो सकता है ।
महात्मा जी ने आगे कहा कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य ही यही है कि सबसे पहले अपने आप को जानें कि ‘हम’ कौन है ? कहाँ से ये आया है और क्या करने आया है ? वास्तव में ‘हम’ शरीर नहीं है ‘हम’ अपने को शरीर समझना ही दुनिया का सबसे बड़ा और पहला झूठ है । यहीं से संसार में झूठ का बीजारोपण शुरु होता है जिससे जीव (रूह-सेल्फ) अज्ञानतावश हमार परिवार (माता-पिता, पति-पत्नि, पुत्र-पुत्री आदि) भ्रमजाल रूप मायाजाल में फँसते हुए पतन और विनाश को जाता हुआ ‘मोक्षपर्यन्त’ चौरासी लाख योनियों के चक्कर में घूमता हुआ दुःसह दुःख रूप ‘जनम और मृत्यु’ की यातनाओं से गुजरता रहता है ।































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