*इलाहाबाद हाईकोर्ट का दिव्यांग सैनिकों के पक्ष में बड़ा फैसला*

लखनऊ , 7

????*29 वर्षों की सैन्य सेवा के बाद न्याय*

????*हाईकोर्ट ने कहा—सैनिकों के अधिकारों पर तकनीकी आपत्तियाँ भारी नहीं पड़ सकतीं*
 

*लखनऊ*। उत्तराखण्ड निवासी पूर्व सैनिक आनरेरी लेफ्टिनेंट एवं एक्स-सूबेदार पुष्कर सिंह कश्याल को लगभग 29 वर्षों की सैन्य सेवा के बाद लंबी कानूनी लड़ाई में महत्वपूर्ण सफलता मिली है। 

वर्ष 1991 में भारतीय सेना में भर्ती हुए पुष्कर सिंह कश्याल को सेवा के दौरान “प्राइमरी हाइपरटेंशन बीमारी हो गई, जिसके बाद उन्हें 31 मार्च 2021 को लो मेडिकल कैटेगरी में सेना से मुक्त कर दिया गया। सेना की रिलीज मेडिकल बोर्ड ने बीमारी को “न सैन्य सेवा से संबंधित और न ही सैन्य सेवा से बढ़ी हुई (एनएएनए)” घोषित करते हुए दिव्यांगता पेंशन देने से इंकार कर दिया।

 इसके विरुद्ध पूर्व सैनिक ने अपने अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय के माध्यम से वर्ष 2023 में सशत्र-बल अधिकरण लखनऊ में वर्ष 2023 में वाद योजित किया । सुनवाई के बाद 05 जुलाई 2023 को सशस्त्र बल अधिकरण ने पूर्व सैनिक के पक्ष में निर्णय देते हुए दिव्यांगता  पेंशन प्रदान करने का त्वरित आदेश पारित किया।

अधिकरण के आदेश के बावजूद भारत सरकार एवं रक्षा मंत्रालय की ओर से आदेश का अनुपालन नहीं किया गया, जिसके कारण पूर्व सैनिक को निष्पादन वाद तक दाखिल करना पड़ा।

 बाद में केंद्र सरकार ने वर्ष 2024 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ खंडपीठ में रिट-ए संख्या 3672/2024 दाखिल कर सशस्त्र बल अधिकरण के आदेश को चुनौती दी। सरकार की ओर से कहा गया कि बीमारी सेना सेवा से संबंधित नहीं थी तथा मेडिकल बोर्ड की राय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। 

वहीं पूर्व सैनिक की ओर से अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय ने न्यायालय में जोरदार पक्ष रखते हुए कहा कि भर्ती के समय सैनिक पूर्णतः स्वस्थ था, बीमारी लगभग 24 से 29 वर्षों की सैन्य सेवा के बाद उत्पन्न हुई और मेडिकल बोर्ड ने बीमारी को सेवा से असंबद्ध बताने के पीछे कोई कारणयुक्त एवं वैज्ञानिक आधार नहीं दिया।

मामले की सुनवाई के बाद माननीय न्यायमूर्ति आलोक माथुर एवं माननीय न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने विस्तृत फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार की रिट याचिका खारिज कर दी। न्यायालय ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल इस आधार पर कि बीमारी “पीस स्टेशन” पर पाई गई, किसी सैनिक को दिव्यांग पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।

 अदालत ने माना कि शांति क्षेत्रों में भी सैनिक कठोर प्रशिक्षण, मानसिक दबाव, अनुशासनात्मक तनाव और सैन्य जिम्मेदारियों के कारण तनावपूर्ण परिस्थितियों में कार्य करते हैं। न्यायालय ने यह भी कहा कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट कारणों से रहित थी तथा किसी सैनिक को पेंशन से वंचित करने के लिए स्पष्ट, ठोस और कारणयुक्त राय आवश्यक है।

उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसलों धरमवीर सिंह बनाम भारत संघ तथा राजुमोन टी.एम. बनाम भारत संघ का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि भर्ती के समय कोई बीमारी दर्ज नहीं थी, तो सामान्यतः उसे सेवा के दौरान उत्पन्न माना जाएगा तथा विपरीत सिद्ध करने का भार सरकार पर होगा। अदालत ने यह भी कहा कि सैनिकों से संबंधित पेंशन नियम कल्याणकारी प्रकृति के हैं और उनकी उदारतापूर्वक व्याख्या की जानी चाहिए। 

अंततः उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार की याचिका को “गुण-दोष रहित” बताते हुए खारिज कर दिया तथा पूर्व सैनिक को समस्त देय लाभों सहित दिव्यांग पेंशन प्रदान किए जाने के आदेश को बरकरार रखा।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय दिव्यांगता पेंशन से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है। 

माना जा रहा है कि इस फैसले के बाद भारत सरकार एवं रक्षा मंत्रालय द्वारा सशस्त्र बल अधिकरण के सुविचारित आदेशों को अनावश्यक रूप से उच्च न्यायालय में चुनौती देने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगने की संभावना है, विशेषकर उन मामलों में जहां मेडिकल बोर्ड द्वारा बिना कारणयुक्त निष्कर्ष के सैनिकों को “एनएएनए” घोषित कर पेंशन से वंचित किया जाता रहा है। यह निर्णय पूर्व सैनिकों के अधिकारों, सम्मान और सामाजिक सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप माना जा रहा है।

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