केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के नासिक परिसर के लिए 41.51 एकड़ भूमि का अधिकार अभिलेख सौंपा

राजस्थान , 26

नासिक। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेन्द्र फडणवीस ने केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के प्रस्तावित नासिक परिसर की स्थापना के लिए आवंटित भूमि का 7/12 अभिलेख (अधिकार अभिलेख) औपचारिक रूप से विश्वविद्यालय को सौंपा। इसके साथ ही नासिक परिसर के विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि जुड़ गई है।

इस अवसर पर केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. आर. जी. मुरलीकृष्ण, मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री मंगेश इन्दापवार, नासिक के जिलाधिकारी श्री आयुष प्रसाद तथा मण्डलायुक्त डॉ. प्रवीण गेडाम सहित वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

विश्वविद्यालय को आवंटित भूमि 16.80 हेक्टेयर अर्थात् लगभग 41.51 एकड़ है। यह भूमि नासिक के शिलापुर ग्राम में प्रस्तावित नासिक रिंग रोड के निकट स्थित है। भूमि सम्बन्धी अधिकार अभिलेख विश्वविद्यालय को सौंपे जाने से प्रस्तावित परिसर के विकास की प्रक्रिया को और गति मिलेगी।

भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अधीन केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा नासिक परिसर को संस्कृत, भारतीय ज्ञान-परम्परा, आधुनिक विज्ञान एवं उभरती प्रौद्योगिकियों के समन्वय पर आधारित बहुविषयक उच्च शिक्षा केन्द्र के रूप में विकसित करने की योजना है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेडी के नेतृत्व में इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना को आगे बढ़ाया जा रहा है।

नासिक परिसर के समग्र विकास के लिए लगभग 300 से 400 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार की गई है, जिसे अनुमोदन एवं वित्तीय सहायता के लिए भारत सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

नासिक परिसर में संस्कृत के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) एवं डेटा साइंस में बी.टेक. पाठ्यक्रम का शुभारम्भ हो चुका है। इस अभिनव शैक्षणिक पहल को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भी उल्लेखित किया गया है। परिसर के पूर्ण रूप से विकसित होने पर विभिन्न शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में लगभग 1,500 विद्यार्थियों के अध्ययन की व्यवस्था प्रस्तावित है।

नासिक परिसर की स्थापना से यह क्षेत्र संस्कृत, अध्यात्म और भारतीय ज्ञान-परम्परा के अध्ययन का एक प्रमुख केन्द्र बनने के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी और उभरते ज्ञान-विषयों की उच्च शिक्षा से भी जुड़ेगा।

केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय की यह पहल भारत की समृद्ध ज्ञान-परम्परा के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार के साथ पारम्परिक भारतीय ज्ञान एवं आधुनिक विज्ञान-प्रौद्योगिकी के सार्थक समन्वय की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

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