आओ प्रकृति को फिर से हरा भरा करने का संकल्प करें _

परिवेश , 586

अस्ल में कोरोना शहर की बीमारी है। गाँव में ( मैं अपने एक प्रिय गाँव की बात कर रहा हूँ... वहाँ सारे कम्पाउण्डर, डॉक्टर्स मेरे घनिष्ठ हैं। कोरोना के लक्षण अमूमन सभी लोगों में हैं। वायरल बुखार आ रहा है,, खाँसी आ रही है,, बदन दर्द भी। सैंपल ले लिए जाएं तो सभी पॉजिटिव आएंगे। लेकिन सब एक दो दिन दवाई लेकर ठीक हो रहे हैं। गाँव के लोग न्यूज़ से कोसों दूर हैं। हाँ, आजकल के नवयुवक घर पे कोविड के आंकड़ें बताकर पैनिक ज़रूर फैला रहे। लेकिन बुजुर्ग लोग उनकी सुनते तक नहीं। मेहनत कर रहे जमकर। 

सुबह नीम का दातुन करते हैं। नाश्ते में रात का साग ( बाजरे की रोटी ), दही और प्याज। पिज्जा, सैंडविच का नाम तक नहीं सुना। पानी मटके और स्टील के पात्र का पीते हैं और खूब पीते हैं। दिन में थकते हैं तो नीम या अन्य झाड़ के नीचे सो जाते हैं। अजवाइन, सौंठ यहाँ हर घर की रसोई में है। देशी घी के बिना रोटी गले के नीचे उतारना ही यहाँ गरीबी समझा जाता है। बहुत कम लोगों के पास साधन हैं,,, कई बा तो पूरे पूरे दिन पैदल चलते हैं। जिनके घर साधन हो गये उनके घुटने दर्द कर रहे हैं।

बीमार होकर यहाँ सोने वाला कोई नहीं मिलेगा। पसीने में कई वायरस बहा दिये गांव ने। हमारे यहाँ बीमारी शहरी रहन सहन से आएगी। हम खुद पैदा नहीं करेंगे। गाँव ने बताया और गाँव ही बताएगा कि वायरस नाम की चिड़िया के पाँव कैसे कतरने हैं। 

एक बुजुर्ग ( जो क़रीबन 90 साल के हैं ) मुझे कल कह रहे थे कि यह जो सिलेंडर से साँस ले रहे हैं... ये ज़िंदा होकर भी कौन सा सीमा पर लड़ने जाएंगे। 

यहाँ लोगों ने जीने मरने का निर्णय प्रकृति पर छोड़ रखा है। गाँव वाले खुद को प्राण-नियंता नहीं मानते। प्रकृति से छेड़छाड़ एवं दुर्व्यवहार शहर वालों को ही भारी पड़ रहा। 

गांव वालों का कहना है अभी भी समय है हर एक शहरवासियों को एक एक पौधा लगाना शुरू कर देना चाहिए, ताकि रेडिमेट ऑक्सीजन न मिलने पर इंसान की जान न जाये। हम सभी प्रकृति की ही संतान हैं, पर प्रकृति भी कहीं न कहीं से तो संतुलन बनाएगी ही.. और फिर हम मानव जीवन का संतुलन बिगड़ेगा।

प्रफुल्ल सिंह "बेचैन कलम"

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