पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम के तृतीय दिवस पर प्रागैतिहासिक संस्कृतियों एवं पुरातात्त्विक कानूनों पर व्याख्यान आयोजित
अन्य खबरे Aug 22, 2026 at 06:45 PM , 18लखनऊ: 22 अगस्त, 2026
उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय द्वारा आयोजित पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम के तृतीय दिवस पर आज दो महत्वपूर्ण व्याख्यान आयोजित किए गए। प्रथम सत्र में प्रो0 अनिल कुमार, विभागाध्यक्ष, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ ने “पाषाण उपकरणों से धातु तक रू प्रागैतिहासिक संस्कृतियों का विकास” विषय पर व्याख्यान दिया। द्वितीय सत्र में श्री इंदु प्रकाश, पूर्व अधीक्षण पुरातत्वविद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भारत सरकार ने "Antiquarian Law: Legal Provisions for Monuments and Sites" विषय पर प्रतिभागियों को संबोधित किया।
प्रथम सत्र में प्रो0 अनिल कुमार ने मानव सभ्यता के प्रारम्भिक विकास तथा प्रागैतिहासिक संस्कृतियों की क्रमिक विकास यात्रा पर प्रकाश डालते हुए पुरापाषाण, मध्यपाषाण, नवपाषाण एवं ताम्रपाषाण काल से धातु युग तक मानव जीवन में हुए तकनीकी, आर्थिक एवं सामाजिक परिवर्तनों की विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि पाषाण उपकरणों से प्रारम्भ हुई मानव की तकनीकी यात्रा ने आखेटक एवं खाद्य-संग्राहक जीवन से कृषि, पशुपालन, स्थायी निवास, मृद्भांड निर्माण तथा धातुओं के प्रयोग तक मानव समाज को क्रमशः विकसित किया। कांस्य एवं लौह के प्रयोग ने उत्पादन, कृषि, शिल्प और सामाजिक संगठन को नई गति प्रदान की। उन्होंने पाषाण से धातु तक के विकासक्रम को मानव की बुद्धि, कौशल, नवाचार और सांस्कृतिक उत्क्रांति का महत्वपूर्ण साक्ष्य बताया।
द्वितीय सत्र में श्री इंदु प्रकाश ने भारत की सांस्कृतिक एवं पुरातात्त्विक धरोहरों के संरक्षण के लिए संविधान में किए गए प्रावधानों, विशेष रूप से अनुच्छेद 49 एवं अनुच्छेद 51।(एफ) का उल्लेख करते हुए कहा कि स्मारकों एवं सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण राज्य के साथ-साथ प्रत्येक नागरिक का भी दायित्व है। उन्होंने Ancient Monuments Preservation Act] 1904, Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains Act, 1958 तथा Antiquities and Art Treasures Act, 1972 सहित प्रमुख कानूनों की जानकारी दी।
उन्होंने संरक्षित स्मारकों एवं पुरातात्त्विक स्थलों की सुरक्षा, उत्खनन के विनियमन, पुरावशेषों के संरक्षण तथा उनकी अवैध चोरी और तस्करी की रोकथाम संबंधी कानूनी प्रावधानों पर प्रकाश डाला। वक्ता ने बताया कि राष्ट्रीय महत्व के संरक्षित स्मारकों के निषिद्ध एवं विनियमित क्षेत्रों में अनधिकृत निर्माण तथा पुरावशेषों एवं कला निधियों के अवैध निर्यात सहित संबंधित कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन दंडनीय अपराध है। उन्होंने प्रभावी कानूनों के सख्त अनुपालन और जनसहभागिता को धरोहर संरक्षण के लिए आवश्यक बताते हुए कहा कि हमारी सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण केवल कानूनी दायित्व ही नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी भी है।
दोनों विद्वान वक्ताओं का विभाग की निदेशक श्रीमती रेनू द्विवेदी द्वारा पौधा एवं स्मृति-चिह्न प्रदान कर स्वागत एवं सम्मान किया गया। कार्यक्रम के अंत में निदेशक महोदया ने सभी का अभिवादन करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम का मंच संचालन सहायक पुरातत्व अधिकारी डॉ0 मनोज कुमार यादव ने किया।
कार्यक्रम में लगभग 100 प्रतिभागियों ने ऑफलाइन तथा 50 प्रतिभागियों ने ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता की। इस अवसर पर विभाग के श्री बलिहारी सेठ, अभयराज सिंह, अनिल सिंह, संतोष कुमार सिंह, आशीष, अकील, अभिषेक, अनिल, दरियाब, लवकुश सहित अन्य अधिकारी-कर्मचारी एवं प्रतिभागी उपस्थित रहे।






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