अदभत समाचार अद्भुत गाँव : जहाँ किसी पार्टी को प्रचार की इज़ाज़त नही

हेडलाइंस , 709

कोई भी इलेक्शन बिना प्रचार के जीता नही जा सकता है . प्रचार चाहे संसदीय सीटो का हो , विधायकी सीटों का हो या पंचायत या पार्षद का चुनाव हो. हर प्रत्याशी अपने क्षेत्र में धुंवाधार  प्रचार करता है . यह अलग बात है कि इलेक्शन जीतने के बाद वह क्षेत्र में जाय या ना जाय . अधिकतर लोग इलेक्शन  जीतने के बाद पांच साल मलाई खाते है , जनता की कोई परवाह नही करते . ल्व्किन क्या आपको मालूम है तमिलनाडु में एक गाँव ऐसा भी है जहा किसी  को भी प्रचार करने की इज़ाज़त नहीं है. आजकल कई राज्यों में प्रचार अपने चरम पर है . बंगाल में तो बिना हिंसा के कोई प्रचार होता ही नही . अभी हाल में कई लोगो की ज़िन्दगी हिंसा की भेंट चढ़ गयी . तमिलनाडु में चुनाव प्रचार स्टारडम से भरपूर अपनी तड़क-भड़क के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इसी राज्य में मदुरै से सटा एक ऐसा गांव भी है, जहां की तीन पीढ़ियों ने देश के पहले चुनाव से लेकर अब तक किसी प्रत्याशी को गांव के अंदर प्रचार की इजाजत नहीं दी है. न तो किसी नेता को गांव-घर में झंडे ,बैनर, पोस्टर और कटआउट्स लगाने की इजाजत है, न ही तमिलनाडु की चुनाव संस्कृति का हिस्सा बन चुके कैश फॉर वोट के लिए यहां कोई जगह है. प्रत्याशी कोई भी हो, उसे गांव की सीमा से ही रवाना कर दिया जाता है.
मदुरै से लगभग 20 किलोमीटर दूर 200 घरों और गरीब 600 मतदाताओं वाला का छोटा सा गांव है ओथावीडू. गांव के ज्यादातर निवासी  100 साल पहले तिरुमंगलम से आकर बसे 3 परिवारों के वंशज हैं. इस गांव के दोनों तरफ 1 किलोमीटर के दायरे में दूसरे गांव भी हैं. दोनों तरफ प्रचार का शोर भी है और पार्टियों के पोस्टर्स-बैनर्स और चुनाव चिह्नों से सजी दीवारें भी. प्रचार के दौरान जमकर ढोल-नगाड़े और पटाखे फोड़ने की परंपरा भी जारी है, लेकिन ओथावीडू गांव में घुसते ही माहौल बिल्कुल शांत नजर जाता है. गांव की सीमा पर बने मंदिर के पास थाली में हल्दी-पानी और पान पर कपूर जलाए महिलाएं खड़ी हैं.
आज यहां दिनाकरन की पार्टी एएमएमके के प्रत्याशी के पारंपरिक स्वागत की तैयारी है. प्रचार वाहन के गांव में घुसते ही लाउडस्पीकर बंद कर दिए गए हैं. यहाँ के लोग बताते हैं कि यह परंपरा यहां आजादी के बाद हुए पहले चुनाव से चली आ रही है. तमिलनाडु में दाह संस्कार भी जश्न की तरह ढोल धमाकों और पटाखों के साथ करने की परंपरा है, लेकिन ओथावीडू में इसकी इजाजत नहीं है. फिल्म स्टार्स को लेकर दीवानगी तो यहां भी है, लेकिन फिल्मों के पोस्टर नहीं लगते. प्रचार से दूरी का कारण पूछने पर यहाँ के लोग  कहते हैं- पार्टियों के प्रचार, भाषणबाजी से आपसी मनमुटाव बढ़ता है. गांव की एकता और सौहार्द हमारे लिए पहले स्थान पर है.
इसलिए हम हर दल के प्रत्याशी का एक जैसा पारंपरिक ढंग से स्वागत करते हैं. गांव की सीमा पर ही अपनी समस्याएं बताते हैं, उनको सुनते हैं. हमारी यह परंपरा राजनीतिक दल भी जानते हैं और वे इसका सम्मान भी करते हैं.मुरुगन के घर में झांकने पर 'कलाइगनर यानि करुणानिधि टीवी' भी नजर आता है तो 'अम्मा फेन' भी. मुरुगन कहते हैं- हमें चुनाव से दिक्कत नहीं है. हम सब किसी न किसी पार्टी से भी जुड़े हैं, लेकिन प्रदर्शन नहीं करते. वोट के बदले पैसा की भी यहां इजाजत नहीं है. ऐसे ही कुछ गांव मदुरै सहित तेनी और विरुधुनगर जिले में भी हैं. जहां चुनाव के बाद हुए झगड़ों के चलते ग्रामीणों ने 80 के दशक से ऐसे ही प्रतिबंध लगाने का निर्णय ले रखा है.

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