यूपी पंचायत चुनाव: योगी कैबिनेट ने आरक्षण प्रक्रिया में किया बदलाव, सपा सरकार का फैसला हुआ दरकिनार, जानें नए प्रावधानों से किसे मिलेगा फायदा

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लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली राज्य सरकार ने सूबे में पंचायत चुनाव से जुड़ा अहम फैसला लिया है। मंत्रिपरिषद ने 2015 के तत्कालीन सपा सरकार के फैसले को पलट दिया है। अब राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में सीटों का आरक्षण नए सिरे से तय किया जाएगा। मंगलवार को पंचायती राज विभाग ने इस बारे में एक प्रस्ताव पेश किया, जिसे कैबिनेट बाई सर्कुलेशन मंजूरी दे दी गई। इसके साथ ही प्रदेश में पंचायत चुनाव में सीटों के रिजर्वेशन को लेकर जारी ऊहापोह खत्म हो गया है। यूपी में मार्च-अप्रैल में स्थानीय चुनाव संपन्न कराए जाएंगे।


साल 2015 के पंचायत चुनाव में तत्कालीन सपा सरकार ने उत्तर प्रदेश पंचायतीराज (स्थानों और पदों का आरक्षण और आवंटन) नियमावली-1994  में संशोधन किया था। इसके बाद ग्राम प्रधान और ग्राम पंचायत सदस्य के पदों के पूर्व में हुए आरक्षण को शून्य माना गया। उक्त चुनाव में सूबे के 71 जिलों में ग्राम पंचायतों का पुनर्गठन हो गया था। पर कानूनी अड़चनों की वजह से चार जिलों गोण्डा, सम्भल, मुरादाबाद और गौतमबुद्धनगर में पुनर्गठन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी थी। 

*पुराने प्रावधान से प्रभावित होता चुनाव*

इन जिलों में पूरानी नियमावली के प्रावधान अभी तक लागू थे। इससे राज्य सरकार उलझन में थी। क्योंकि इन चार जिलों में फिर से आरक्षण शून्य कर नई आरक्षण प्रक्रिया अपनानी पड़ती। जबकि बाकी के 71 जिलों में 2015 के चुनाव में हुए चक्रानुक्रम आरक्षण के मुताबिक सीटों का बंटवारा होता। अगर ये पुराने प्रावधान जारी रहते, तो इस बार के पंचायत चुनाव में दो तरह के आरक्षण लागू होते। इससे अराजकता की स्थिति पैदा होती। इसीलिए सरकार ने इन सभी प्रावधानों को नियमावली से हटाने का फैसला लिया। इस संबंध में मंगलवार को कैबिनेट बाई सर्कुलेशन को मंजूरी दी गई। अब सभी 75 जिलों में आरक्षण का एक जैसा फॉर्मूला लागू होगा। 

*मुख्यमंत्री ने दिए जरूरी निर्देश*

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मसले पर नजर बनाए हुए हैं। उन्होंने विभाग को निर्देश दिया है कि कोई भी पंचायत जातिगत आरक्षण से न छूटे। इस बार के चुनाव में कोई भी पंचायत जातिगत आरक्षण से वंचित नहीं रहेगी। प्रदेश के सभी जिलों में पंचायतों के वार्डों के आरक्षण में एक समान नीति लागू होगी। इस बार आरक्षण तय करते वक्त उन ग्राम पंचायतों की पहचान की जाएगी, जहां वर्ष 1995 से अब तक हुए पांच त्रि-स्तरीय पंचायत चुनावों में ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत प्रमुख व जिला पंचायत अध्यक्ष के पद जातिगत आरक्षण से वंचित रह गये हैं। 

*18 हजार ग्राम पंचायतों में नहीं लागू हो सका*

साल 1995 में त्रि-स्तरीय पंचायत व्यवस्था और उसमें आरक्षण के प्रावधान पहली बार लागू किए गए थे। पर कुछ हजारों ग्राम पंचायतें इससे छूट गईं। अब तक पांच पंचायत चुनावों में सूबे की तकरीबन 18 हजार ग्राम पंचायतें, करीब 100 क्षेत्र पंचायतें और आधा दर्जन जिला पंचायतों में क्रमश: ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत अध्यक्ष के पद आरक्षित होने से वंचित रह गए।

*आरक्षण का आधार बदलेगा*

योगी आदित्यनाथ नीत प्रदेश सरकार इस बार स्थानीय चुनावों में बदलाव करने की तैयारी में जुटी है। इस बार के चुनाव में आरक्षण तय करते वक्त सबसे पहले उन पंचायतों की पहचान की जाएगी, जहां साल 1995 से अब तक के चुनावों में सीटें अनुसूचित जाति (एससी) व अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षित नहीं हो पाई हैं। इन सभी में इस बार प्राथमिकता के आधार पर आरक्षण लागू किया जाएगा। नए नियम के मुताबिक जो पंचायतें पहले एससी के लिए आरक्षित होती रहीं और ओबीसी के आरक्षण से वंचित रह गईं, वहां ओबीसी का आरक्षण दिया जाएगा। 


इसी तरह, जिन पंचायतों में अब तक ओबीसी का रिजर्वेशन रहा है, वहां सीटें एससी को आरक्षित दी जाएंगी। इस प्रक्रिया के बाद जो पंचायतें बचेंगी, उनमें सीटें जनसंख्या के घटते अनुपात में चक्रानुक्रम के मुताबिक सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित रहेंगी। गत पांच स्थानीय चुनावों में महिलाओं के लिए निर्धारित 33 फीसदी आरक्षण का कोटा पूरा होता रहा। पर, एससी के लिए 21 प्रतिशत और ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण कोटे के हिसाब से कई ग्राम, क्षेत्र और जिला पंचायतों में सीटें आरक्षित नहीं हो पाईं।

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